ब्रह्ममुहूर्त में हो स्नान
माघ मास का स्नान कुछ इलाकों में तो सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आते ही यानी मकर संक्रांति के दिन से शुरू होता है, लेकिन अधिकतर स्थानों पर इसकी शुरुआत पौष पूर्णिमा के दिन से ही हो जाती है। स्नान का उत्तम समय सूर्योदय से पूर्व माना जाता है, जब आकाश में तारागण दिखाई दे रहा हो। नारदपुराण के अनुसार, माघ मास में ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने से सभी महापातक दूर हो जाते हैं और प्राजापत्य-यज्ञ का फल प्राप्त होता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदित्य, मरुदगण और अन्य सभी देवी-देवता माघ में संगम स्नान करते हैं। मान्यता है कि प्रयाग में माघ मास में तीन बार स्नान करने का फल दस हजार अश्वमेघ यज्ञ से भी ज्यादा होता है।
आते हैं ये व्रत-त्योहार
माघ माह के दौरान कृष्ण पक्ष में सकट चौथ (गणेश चतुर्थी व्रत) षटतिला एकादशी, लोहड़ी, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या आती है, तो शुक्ल पक्ष में वरदतिलकुन्द-विनायक चतुर्थी, वसंत पंचमी, शीतला षष्ठी, रथ-अचला सप्तमी, जया एकादशी व्रत और माघी पूर्णिमा जैसे पर्व आते हैं। मकर संक्रांति में 14 जनवरी से ही देवों के दिन शुरू होते हैं, उत्तरायण शुरू होता है। गंगापुत्र भीष्म ने अपनी देह का त्याग उत्तरायण में ही किया था।
सूर्य को अर्घ्य और दान भी है खास
पदमपुराण के अनुसार, पूजा, तपस्या, यज्ञ आदि से भी श्री हरि को उतनी प्रसंनता नहीं होती, जितनी कि माघ महीने में प्रातः स्नान कर जगत को प्रकाश देने वाले भगवान सूर्य को अर्घ्य देने से होती है। इसलिए सभी पापों से मुक्ति और भगवान जगदीश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान कर सूर्य मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य को अर्घ्य अवश्य प्रदान करना चाहिए। इस मास में तिल, गुड़ और कंबल के दान का विशेष महत्त्व माना गया है। ऊनी वस्त्र, रजाई, जूता और जो भी शीत निवारक वस्तुएं हैं, उनका दान कर 'माधवः प्रीयताम' यह वाक्य कहना चाहिए। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि माघ मास में जो व्यक्ति ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करता है, उसे ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है।
अमर उजाला के खुला पन्ना से साभार