यदि पूजन विधि में कोई त्रुटि हो गई हो तो आरती के माध्यम से उसे त्रुटि की पूर्ति हो जाती है।
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आरती को 'आरात्रिक' अथवा 'नीराजन' के नाम से भी पुकारा गया है। घर और मंदिर में आरती करने की विधि अलग अलग होती है। शंख-ध्वनि और घंटे-घड़ियाल आरती के प्रधान अंग हैं। प्राचीन काल में प्रभु की उपासना कई विधियों द्वारा की जाती रही है। जैसे संध्या वंदन, प्रात: वंदन, प्रार्थना, हवन, ध्यान, भजन, कीर्तन आदि। आरती पूजा के अंत में की जाती है।
आरती क्यों करते हैं : ऐसा माना जाता है कि यदि पूजन विधि में कोई त्रुटि हो गई हो तो आरती के माध्यम से उसे त्रुटि की पूर्ति हो जाती है। आराध्य के पूजन में जो कुछ भी त्रुटि या कमी रह जाती है, उसकी पूर्ति आरती करने से हो जाती है।
आरती के प्रकार : आरती मुख्यत: 7 प्रकार की होती है।
1. मंगला आरती, 2. पूजा आरती, 3. श्रृंगार आरती, 4. भोग आरती, 5. धूप आरती, 6. संध्या आरती, 7. शयन आरती। उपरोक्त आरती में समय से अधिक प्रहर का ध्यान रखा जाता है। धूप आरती और पूजा आरती सामान्यत: कम ही करते हैं।
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आरती कैसे की जाती है
- मुख्यत: 5 या 7 बत्ती वाले दीपक से आरती करना शुभ और सर्वोत्तम माना गया है।
- इसके अलावा सामान्यत: 1, 3, 5, 7 विषम संख्या के दीपों द्वारा भी आरती की जाती है।
- मंदिरों में साधारणतया 5 बत्तियों वाले दीप से आरती की जाती है जिसे 'पंचप्रदीप' कहा जाता है।
- अलग अलग संख्या वाले दीप से आरती करने का अपना अलग अलग महत्व शास्त्रों में बताया गया है।
- आरती के लिए दीपक जलाने के बाद, दीपक को प्रणाम करके निम्नलिखित मंत्र बोला जाता है-
शुभम करोति कल्याणम आरोग्यम् धनसंपदा। शत्रु बुद्धि विनाशाय दीपज्योति नमोऽस्तु ते।
दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन: । दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते ॥
- आरती के समय शंख एवं घंटे घड़ियाल का वादन भी करना आवश्यक है।
- रुई या कपास की बत्ती के अलावा कर्पूर से भी आरती की जाती है।
- जब हम आरती करते हैं तो सर्वप्रथम भगवान के चरणों से प्रारंभ करना चाहिए।
- चरणों में चार बार, नाभि के सम्मुख दो बार और भगवान के मुख के समक्ष एक बार आरती घुमानी चाहिए।
- फिर सात बार भगवान के संपूर्ण शरीर पर अर्थात चरणों से मस्तक तक आरती घुमानी चाहिए।
- इस तरह आरती कुल 14 बार घुमाई जानी चाहिए ऐसा आरती का विधान बताया जाता है।
- हालांकि शास्त्रों के अनुसार विष्णु भगवान जी की बारह बार, शिवजी की ग्यारह बार, दुर्गाजी की नौ बार, गणेशजी की चार बार और अन्य देवी देवताओं की 7 बार आरती करने का विधान है।
- दीप आरती के अंत में कर्पूर आरती करते हैं। आरती के बाद पुष्पांजलि मंत्र भी बोला जाता है।
- आरती के बाद स्तुति बोलते हैं- कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि।।
आरती के नियम और सावधानी
1. आरती के समय या आरती के बाद दीपक को कभी भी भूमि पर नहीं रखना चाहिए। उसे थाली, पाट या आसन पर ही रखना चाहिए।
2. दीपक में शुद्ध घी या तेल डालकर दीप प्रज्वलित कर सकते हैं। सरसों और नारियल के तेल का उपयोग विशेष परिस्थिति में ही करते हैं।
3. घी का दीपक भगवान के दक्षिण की ओर अर्थात सीधे हाथ की ओर, तेल का दीपक वाम भाग अर्थात बाईं ओर लगाना चाहिए।
4. तेल और घी का मिश्रित दीपक नहीं चलाना चाहिए।
5. दीपक का मुख पूर्व दिशा में रखने पर आयु में वृद्धि, उत्तर में रखने पर धन धान्य में वृद्धि, पश्चिम में रखने पर दु:ख और दक्षिण में रखने पर हानि देने वाला होता है।
6. घी के दीपक में कपास की बत्ती और तेल के दीपक में लाल मौली की बाती होना चाहिए।
7. आरती कभी भी अखंड जलाए गए दीपक से नहीं करना चाहिए।
8. आरती कभी भी बैठकर नहीं करना चाहिए।
9. आरती के बीच में उस पर से हाथ नहीं घुमाना चाहिए। पूरी आरती होने के बाद उसे जल के छींटे लगाकर ठंडा करना चाहिए और फिर भगवान को समर्पित करना चाहिए। इसके बाद ही सभी को आरती लेना करना चाहिए।
10. आरती के बीच में बोलना, चीखना या अन्य कोई दूसरा कार्य नहीं करना चाहिए। इससे आरती खंडित मानी जाती है।
11. आरती कभी भी बीच में बुझे नहीं, इस प्रकार की व्यवस्था करना चाहिए।
12. आरती को कभी भी उल्टा नहीं घुमाना चाहिए।
13. बिना पूजा उपासना या भजन के आरती नहीं की जाती।
14. आरती से ऊर्जा लेते समय सिर अवश्य ढक लेना चाहिए। खासकर महिलाओं को ऐसा करना चाहिए।
15. दोनों हाथों को ज्योति के ऊपर घुमाकर नेत्रों पर और सिर के मध्य भाग पर लगाना चाहिए।
16. आरती लेने के बाद कम से कम पांच मिनट हाथ नहीं धोने चाहिए।