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होली से पहले के वह आठ दिन अशुभ, कोई शुभ काम नहीं होता

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होली जलाने और खेलने के रूप में उत्सव भले ही फाल्गुन पूर्णिमा और चैत्र प्रतिपदा को मनाया जाता है। लेकिन शुरुआत सात दिन पहले और धुलैंडी के लिहाज से आठ दिन पहले से हो जाती है होलाष्टक के रुप में जो इस वर्ष 26 फरवरी को है।
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वसंत की मस्ती और उल्लास लोगों में ही नहीं प्रकृति में भी फाल्गुन अष्टमी के दिन से उमंग उठता है। परंपरा में इस तिथि से रंग खेलने के दिन तक होलाष्टक मनाया जाता है।

होली के चरित नायक और इष्ट आराध्य की भूमि मथुरा, वृंदावन समेत ब्रज का चप्पा-चप्पा रंग, अबीर और गुलाल से रंग-बिरंगा हो उठता है।

लोक और शास्त्र में ये आठ दिन (होलिका दहन से सात दिन पहले और अगले दिन धूलिवंदन) तक होलाष्टक के नाम से विख्यात हैं। इन दिनों की अपनी छटा है। समूची ब्रज भूमि का उल्लास देखने लायक होता है।
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क्यों हैं यह आठ दिन अशुभ?

होलिका की अनेक सामाजिक और धार्मिक अंतर्कथाओं में प्रह्लाद को बचाने के लिए अग्नि के भी शीतल हो उठने का प्रसंग सबसे ज्यादा विख्यात है। होलिका को सिद्धि प्राप्त थी कि आग से उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। इसी गुमान के कारण वह भक्त प्रह्लाद को हरिभक्ति के अपराध का दंड देने के लिए, जीवित ही जला देने के लिए उसे गोद में लेकर जलती हुई बैठ गई।

प्रह्लाद का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन होलिका ही धू-धू कर जल मरी। संदेश यह है कि सचाई और भावभक्ति के ईमानदार रास्ते पर चलने वाला का कोई अनिष्ट होता ही नहीं। प्रभु उसकेरक्षक बन कर आते हैं। एक अलग प्रसंग है कि भगवान शिव ने इसी दिन कामदेव को क्रोध से भस्म कर दिया था। विकार पर शिव की विजय का उत्सव भी शुभ के अशुभ को नष्ट कर देने का भाव है।

हिरण्यकश्यपु के अवतार लेने से पहले होलिका के जरिए उत्तर भारत में होलाष्टक के इन आठ दिनों में कोई शुभ कार्य नहीं किए जाते। जिस जगह प्रह्लाद और होलिका की प्रतीक रूप में स्थापना की जाती है, उसके आसपास तो कतई नहीं। किसी पुण्य अनुष्ठान में पहले से दीक्षित व्यक्ति तो उन स्तंभ या डंडो को छूते भी नहीं। होलिकादहन की तैयारी के साथ ही मौसम, माहौल में भी घुल उठने वाले भाव, आनंद में रसविभोर करते गीत नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ प्रकृति का रंग भी खिल उठता है।
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होलिका दहन के बारे में जानें यह खास बात

आत्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर उल्लास का वातावरण बनता है। जहां होली जलाई जाती है, उस जगह को गंगाजल से शुद्ध करने के बाद ही सूखी लकड़ियां, उपले तथा घास आदि के रूप में भक्ति और दाहक ऊष्मा, दो स्तम्भों (डंडों) की स्थापना को लोग अलग अलग रूपों में देखते हैं।

उन सबका सार द्वेष और वीभत्स पर भक्ति और भाव की जीत तथा उस जीत का उल्लास है। समझा जाता कि अन्य होलिका दहन में मुहूर्त जरूर देखना चाहिए।

सावधानी बरतने के लिए मनीषियों ने कहा है कि पूर्णमासी में प्रदोष काल में और भद्रा समाप्त हो जाने के बाद ही होली जलाएं।

यदि प्रदोष काल में भद्रा भी है किन्तु मध्य-रात्रि से पहले भद्रा समाप्त हो रहा है, ऐसी स्थिति में भद्रा की मौजूदगी में ही होलिकादहन किया जा सकता है।
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