होली के आठ दिन पहले होलाष्टक आरंभ हो जाते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलिका दहन के समय को होलाष्टक कहा जाता है। होलाष्टक के आठ दिनों के दौरान कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किया जाता। 21 मार्च से होलाष्टक की शुरुआत हो गई है, जोकि 28 मार्च को होलिक दहन के साथ खत्म हो जाएगा।
होलाष्टक में पूजा-पाठ विशेष महत्व
होलाष्टक के दौरान विवाह, ग़ृहप्रवेश, मुंडन, नामकरण एवं विद्यारंभ आदि सभी मांगलिक कार्य या कोई नवीन कार्य प्रारम्भ करना शास्त्रों के अनुसार वर्जित माना गया है। मान्यता है कि होलाष्टक के दौरान भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्राद को तरह-तरह के कष्ट सहने पड़ते हैं जिसके कारण भगवान को भी पीड़ा पहुंचती है, इसी कारण से आठ दिनों तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। ऐसे में इस दौरान पूजा-पाठ और दान का महत्व और भी बढ़ जाता है। वहीं होलाष्टक के दौरान कुछ विशेष उपाय करने से आर्थिक,मानसिक और बीमारियों से मुक्ति मिल जाती है और घर में सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है।
होलाष्टक के दौरान पूजा
होलाष्टक पर भगवान शिव और कृष्णजी की पूजा आराधना करने से सभी तरह की मनोकामना अवश्य ही पूरी होती है।
हवन- होलाष्टक के दौरान व्यवसाय और नौकरी में चली आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए घर या प्रतिष्ठान में हवन का आयोजन करवाना चाहिए।
महामृत्युंजय मंत्र- बड़ी से बड़ी बाधा को दूर करने के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है। महामृत्युंजय मंत्र से व्यक्ति काल के मुंह जाने से बच जाता है। इसके आलावा महामृत्युंजय मंत्र जाप से व्यक्ति को अच्छी सेहत की प्राप्ति होती है।
श्रीसूक्त और मंगल ऋण मोचन स्त्रोत का पाठ- होलाष्टक के दौरान अगर कोई व्यक्ति पैसों की तंगी और कर्ज के बोझ से दबा है तो छुटकारा पाने के लिए श्रीसूक्त और मंगल ऋण मोचन स्त्रोत का पाठ अवश्य करना चाहिए।
भगवान गणेश की स्तुति- होलाष्टक के दौरान गणेश वंदना और आरती बहुत ही फलदायी होता है। इसके अलावा हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से भी कष्ट दूर होते हैं।