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Holashtak 2021: होलाष्टक में शुभ कार्य क्यों वर्जित?

Thu, 18 Mar 2021 11:35 AM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य

सार

होलाष्टक 21 मार्च, रविवार मंगल के नक्षत्र मृगशिरा में आरम्भ हो रहा है जो 28 मार्च होलिका दहन के साथ ही समाप्त होगा। सनातन धर्मग्रन्थों के अनुसार फाल्गुन शुक्लपक्ष की अष्टमी होलाष्टक तिथि का आरंभ है। इस तिथि से पूर्णिमा तक के आठों दिनों को होलाष्टक कहा गया है।
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होलाष्टक 2021 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सभी मांगलिक एवं शुभकार्यों में त्याज्य होलाष्टक 21 मार्च, रविवार मंगल के नक्षत्र मृगशिरा में आरम्भ हो रहा है जो 28 मार्च होलिका दहन के साथ ही समाप्त होगा। सनातन धर्मग्रन्थों के अनुसार फाल्गुन शुक्लपक्ष की अष्टमी होलाष्टक तिथि का आरंभ है। इस तिथि से पूर्णिमा तक के आठों दिनों को होलाष्टक कहा गया है। होलाष्टक का आठ दिवसीय अवधिकाल भक्ति की शक्ति का प्रभाव दिखाने का है। सतयुग में हिरण्यकश्यपु ने घोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से अनेकों वरदान पा लिए। वरदान के अहंकार में आकंठ डूबे हिरण्यकश्यपु ने अनाचार, दुराचार का मार्ग चुन लिया। भगवान विष्णु से अपने भक्त की यह दुर्गति सहन नहीं हुई और उन्होंने हिरण्यकश्यपु के उद्धार के लिए अपना अंश उनकी पत्नी कयाधू के गर्भ में स्थापित कर दिया, जो जन्म के बाद प्रह्लाद कहलाए। प्रह्लाद जन्म से ही ब्रह्मज्ञानी थे। वे हरपल भक्ति में लीन रहते। उन्हें सभी नौ प्रकार की भक्ति प्राप्त थीं, जिनका उन्होंने इस तरह वर्णन किया है- श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पाद सेवनम।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्म निवेदनम। यानी श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदनम।
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प्रह्लाद की भक्ति का उनके पिता हिरण्यकश्यपु बहुत विरोध करते थे। इनको भक्ति से विमुख करने के उनके सभी उपाय जब निष्फल होने लगे तो उन्होंने प्रह्लाद को फाल्गुन शुक्लपक्ष अष्टमी को बंदी बना लिया और मृत्यु हेतु तरह-तरह की यातनाएं देने लगे। प्रह्लाद विचलित नहीं हुए। इस दिन से प्रतिदिन प्रह्लाद को मृत्यु देने के अनेकों उपाय किए जाने लगे, पर वे हमेशा बच जाते। इसी प्रकार सात दिन बीत गए। आठवें दिन अपने भाई हिरण्यकश्यपु की परेशानी देख उनकी बहन होलिका (जिसे ब्रह्मा द्वारा अग्नि से न जलने का वरदान था) ने प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में भस्म करने का प्रस्ताव रखा और होलिका जैसे ही अपने भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती आग में बैठी, वह स्वयं जलने लगी और प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ।
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तभी से भक्ति पर आघात हो रहे इन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। भक्ति पर जिस-जिस तिथि, वार को आघात होता, उस दिन और तिथियों के स्वामी भी हिरण्यकश्यपु से क्रोधित हो जाते थे। इसीलिए इन आठ दिनों में क्रमश: अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध एवं चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए माने जाते हैं। इसी कारण से इन दिनों में गर्भाधान, विवाह, नामकरण, विद्यारम्भ, गृह प्रवेश व निर्माण आदि अनुष्ठान अशुभ माने गए हैं। तभी से फाल्गुन शुक्ल अष्टमी के दिन से ही होलिकादहन स्थान का चुनाव किया जाता है। पूर्णिमा के दिन सायंकाल शुभ मुहूर्त में अग्निदेव की शीतलता एवं स्वयं की रक्षा के लिए उनकी पूजा करके होलिका दहन किया जाता है। होलिका पूजन का उद्देश्य यह है कि हे अग्निदेव ! आप शीतल होकर भक्त प्रहलाद की रक्षा करें।
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