इस हफ्ते 5 अक्तूबर से शक्ति की उपासना का पर्व दुर्गा पूजा आरंभ हो जाएगा। शास्त्रों के अनुसार आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मां दुर्गा पृथ्वी पर निवास करती हैं इसलिए इसे नवरात्र के नाम से जाना जाता है। महालया के दिन जब सभी पितृगण पृथ्वी से अपने लोक लौट रहे होते हैं उसी दिन मां अपने लोक से पृथ्वी के लिए प्रस्थान करती हैं।
माता का वाहन यूं तो सिंह है लेकिन तिथि के अनुसार हर साल माता का वाहन अलग-अलग होता है। यानी माता सिंह की बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती हैं। इस संदर्भ में शास्त्रों में कहा गया है कि 'शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकीर्त्तिता' इसका अर्थ है सोमवार व रविवार को प्रथम पूजा यानी कलश स्थापन होने पर मां दुर्गा हाथी पर आती हैं।
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शनिवार तथा मंगलवार को कलश स्थापन होने पर माता का वाहन घोड़ा होता है। गुरुवार अथवा शुक्रवार के दिन कलश स्थापन होने पर माता डोली पर चढ़कर आती हैं। बुधवार के दिन कलश स्थापन होने पर माता नाव पर सावर होकर आती हैं।
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माता जिस वाहन से पृथ्वी पर आती हैं उसके अनुसार वर्ष में होने वाली घटनाओं का भी आंकलन किया जाता है। इस वर्ष कलश स्थापन 5 अक्तूबर यानी शनिवार के दिन है। इसलिए इस वर्ष माता घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं। घोड़ा युद्ध का प्रतीक माना जाता है। घोड़े पर माता का आगमन शासन और सत्ता के लिए अशुभ माना गया है। इससे सरकार को विरोध का सामना करना पड़ता है और सत्ता परिवर्तन का योग बनता है।
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बीते साल भी माता इसी वाहन पर आई थी जिसका परिणाम है कि पूरे साल देश की राजनीति में उथल-पुथल मची रही। देश को कई विकट स्थितियों का सामना करना पड़ा। देश के कई भागों में प्राकृतिक आपदा के कारण जान-माल का नुकसान हुआ। पंडित मुरली झा के अनुसार इन दिनों पड़ोसी देश के साथ संबंध में कड़वाहट का एक कारण माता का घोड़ा पर आना हो सकता है।
विजयादशमी 13 अक्तूबर रविवार के दिन है। शास्त्रों के अनुसार रविवार के दिन विजयादशमी होने पर माता हाथी पर सवार होकर वापस कैलाश की ओर प्रस्थान करती हैं। माता की विदाई हाथी पर होने से आने वाले साल में खूब वर्षा होगी। जिससे उन्न का उत्पादन खूब होगा।