संपूर्ण जगत ईश्वर से ही आच्छादित है। उसके अनंत रूप को जान लेना ही वास्तविक ज्ञान है। सभी धर्मों में माना गया है कि ईश्वर के रूप अलग हैं, लेकिन वह एक है।
अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘जो लोग श्रद्धापूर्वक किसी भी देवसत्ता की पूजा-उपासना करते हैं वह अलग-अलग रास्तों पर चलते हुए उसी परम तत्व तक पहुंचते हैं।
ईशावास्योपनिषद् के प्रथम मंत्र में ही कहा गया है 'ईशावास्यामिदं सर्व यत्किन्व जगत्यां जगत।' अर्थात यह संपूर्ण जगत ईश्वर से ही आच्छादित है। चीन के प्रसिद्ध संत लाओप्स ने 'ताओ-ते-किंग' में लिखा है- 'उस अनंत को जान लेना ही वास्तविक ज्ञान है।' जैन ग्रंथों में ईश्वर के बारे में कहा गया है- 'उसे नमस्कार है, जो अनेक में एक है तथा जो एक एवं अनेक में परे भी है।' पारसी मत के अनुसार, 'ईश्वर एक है, उसे अहूरमज्दा के नाम से संबोधित किया जाता है, जिसका अमर्त्य है- ‘ज्ञानेश्वर सर्वशक्तिमान परमात्मा।’ पारसी ग्रंथ की गाथा में वर्णन है- 'उस ईश्वर के अतिरिक्त मैं और किसी को नहीं जानता हूं।' मिस्र निवासियों की मान्यता ईश्वर के संबंध में इस प्रकार है- 'जीवन की सृष्टि करने वाला वह अनंत एवं सर्वव्यापी है, उसे आंखों से देखा नहीं जा सकता, वही एक है निराकार है।'
आॅस्ट्रेलिया के रहने वालों की ईश्वर संबंधी धारणा में एक सार्वकालिक एवं दिव्य लोकवासी प्राणी की मान्यता को स्थान मिला है, जिसे वे परम पिता कहकर भक्ति करते हैं। यहूदियों को भी हजरत मूसा ने एक ईश्वर की पूजा करने का उपदेश दिया था। इस्लाम धर्म में ईश्वर को अल्लाह या खुदा कहा जाता है, कयामत या महाप्रलय में केवल वही रह जाता है। कुरान में एक जगह कहा गया है- 'वही प्रारंभ्ा में था, वही अंत में रहेगा। वह सर्वज्ञाता(सब कुछ जानने वाला) है। उसका अनंत ज्ञान सब चीजों को घेरे हुए है। सब में वही समाया है।' इसी से मिलता-जुलता वर्णन बाइबल में मिलता है। बाइबल में कहा गया है कि ‘मैं ही सबका आदि हूं और सबका अंत भी मैं ही हूं। मेरे अलावा अन्य कोई नहीं है। मैं ही वह प्रकाश हूं, जो हर एक को प्रकाशित करता हूं। मेरे बिना कोई भी प्राणी हलचल नहीं कर सकता।'