भगवान को कभी कुछ अर्पित करो, तो प्रेम से करो। भगवान स्वीकार करेंगे। यह हुआ कल्याण का मार्ग, मोक्ष का मार्ग। यह दान नहीं हुआ। दान तो बहुत छोटी चीज है। भरत जी पूजन करते हैं राम की चरण पादुका का। सिंहासन पर प्रतिष्ठित करके राजा के रूप में उनका सम्मान करते हैं, उनकी आज्ञा लेते हैं।
तुलसीदास ने अयोध्या कांड के अंत में लिखा है, ‘नित पूजत प्रभु पांवरी’-भरत जी पादुका की रोज पूजा करते हैं। भरत जी चरण पादुका का पूजन कैसे करते थे, काग भुसंडी रामायण में वर्णित है। तुलसीदास ने लिखा- ‘प्रीति न हृदयं समाति।’ जैसे नदी अपने तटों को लांघ जाती है, उछाल लेकर तटों से बाहर आ जाती है, अब तट नहीं रह पाए, तट सामर्थ्यहीन हो गए, वैसे ही प्रेम उमड़ना चाहिए कि लगे कि आपके संभालने में नहीं आ रहा है।
भरत जी ऐसा ही पूजन करते हैं। ईश्वर को हम क्या देंगे, वह सर्वसाधन संपन्न है। वह ऐश्वर्यशाली है। समग्र ऐश्वर्य का नाम भग है, संपूर्ण यश का नाम भग, संपूर्ण सुंदरता का नाम भग है। संपूर्ण ज्ञान का नाम भग है, वैराग्य का नाम भग है, सब तो इसी में आ गए और भग जिसके पास हो, उसे भगवान कहते हैं। सब कुछ जब भगवान के पास है, तो हम भगवान को क्या देंगे। ध्यान दीजिए, पत्ता कोई भी चलेगा, तुलसी का ही नहीं, बेल पत्र ही नहीं, कोई भी पत्ता दीजिए। भगवान का बनाया हुआ है। दीजिए पत्ता। खाली हाथ भगवान के यहां नहीं आएं।