गणपति विसर्जन 2025: भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा के साथ-साथ गणपति बप्पा का विसर्जन भी किया जाता है।
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Ganesh Visarjan 2025: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा के साथ-साथ गणपति बप्पा का विसर्जन भी किया जाता है। गणेश चतुर्थी से लेकर दस दिनों तक भक्तगण विघ्नहर्ता की आराधना करते हैं और अनंत चतुर्दशी पर उन्हें विदा करते हैं। गणेश चतुर्थी पर भक्त अपने घरों और मंदिरों में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं। दस दिनों तक पूजा, आरती, भजन और अनुष्ठान के माध्यम से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त की जाती है। मान्यता है कि इन दिनों गणेश जी भक्तों के घर-परिवार में निवास करते हैं और उनकी सभी बाधाओं को दूर करते हैं। गणेश विसर्जन का सबसे प्रमुख पौराणिक कारण महाभारत की रचना से जुड़ा हुआ है।
महर्षि वेदव्यास से जुडी है कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना के लिए गणेशजी का आह्नान किया था। उनसे महाभारत को लिपिबद्ध करने की प्रार्थना की। गणेश जी ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार तो किया परन्तु उन्होंने एक शर्त रखी 'कि मैं जब लिखना प्रारंभ करूंगा तो कलम को रोकूंगा नहीं, यदि कलम रुक गई तो लिखना बंद कर दूंगा'।
तब वेदव्यासजी ने कहा कि भगवन आप देवताओं में अग्रणी हैं,विद्या और बुद्धि के दाता हैं और मैं एक साधारण ऋषि हूँ। यदि किसी श्लोक में मुझसे त्रुटि हो जाय तो आप उस श्लोक को ठीक कर उसे लिपिबद्ध करें।गणपति जी ने सहमति दी और दिन-रात लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ और इस कारण गणेश जी को थकान तो होनी ही थी, लेकिन उन्हें पानी पीना भी वर्जित था।
अतः गणपति जी के शरीर का तापमान बढ़े नहीं, इसलिए वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की पूजा की। मिट्टी का लेप सूखने पर गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई, इसी कारण गणेश जी का एक नाम पार्थिव गणेश भी पड़ा। महाभारत का लेखन कार्य 10 दिनों तक चला और अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य संपन्न हुआ।
वेदव्यास ने देखा कि, गणपति का शारीरिक तापमान फिर भी बहुत बढ़ा हुआ है और उनके शरीर पर लेप की गई मिट्टी सूखकर झड़ रही है, तो वेदव्यास ने उन्हें पानी में डाल दिया। इन दस दिनों में वेदव्यास ने गणेश जी को खाने के लिए विभिन्न पदार्थ दिए। इसी परंपरा के प्रतीकस्वरूप गणेश जी की मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है और दस दिनों तक पूजा करने के बाद उसका जल में विसर्जन किया जाता है। यह मान्यता है कि जैसे गणेश जी के शरीर की मिट्टी जल में विलीन हुई थी, वैसे ही प्रतिमा भी जल में प्रवाहित की जाती है।