चतुर्थी पर क्यों नहीं किए जाते चंद्रमा के दर्शन (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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इस संबंध मे कई कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से एक कथा इस प्रकार है- एक बार रात्रि के समय गणेश जी अपने मूषक पर सवार होकर खेल रहे थे। कि अचानक मूषकराज को सर्प दिखा जिसे देखकर वे भय के मारे उछल पड़े, उनकी पीठ पर सवार गणेश जी भूमि पर जा गिरे। गणेश जी ने उठकर देखा कि कहीं कोई उन्हें देख तो नहीं रहा है। लेकिन रात्रि होने के कारण वहां कोई उपस्थित नहीं था। तभी अचानक किसी के जोर से हंसने की आवाज आई। यह आवाज किसी और की नहीं चंद्रदेव की थी। चंद्रदेव ने बप्पा का उपहास उड़ाते हुए कहा कि छोटा सा कद, और गज का मुख यह बात सुनकर गणेश जी को क्रोध आ गया, गणेश जी की सहायता करने के बजाय चंद्रदेव उनके स्वरुप का उपहास बना रहे थे।
गणेश जी ने कहा कि जिस सुंदरता के अभिमान के कारण तुम मेरा उपहास उड़ा रहे हो, वह सुंदरता नष्ट हो जाएगी। गणेश जी के श्राप के कारण चंद्रदेव का रंग काला पड़ गया और समस्त संसार में अंधेरा हो गया, तब सभी देवों ने गणेश जी को समझाया और चंद्रदेव ने उनसे क्षमा मांगी। तब गणेश जी ने कहा कि मैं अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकता लेकिन माह में एक बार आप पूर्ण रुप से काले रहेंगे और फिर धीर-धीरे प्रतिदिन आपका आकार बड़ा होता जाएगा।
जिससे माह में आप एक बार अपने पूर्ण रुप में दिखाई देंगे। कहा जाता है तभी से चंद्रमा घटता-बढ़ता है। यह दिन चतुर्थी का दिन था। गणेश जी ने कहा कि मेरे वरदान के कारण आप दिखाई अवश्य देंगे, लेकिन इस दिन कोई भी अगर आपके दर्शन करेगा तो उसे अशुभ फल की प्राप्ति होगी। ताकि लोगों को यह बात स्मरण रहे। कहा जाता है तभी से चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन वर्जित माने गए हैं।