एक बार की बात है कि धन के देवता कुबेर को अभिमान हो गया था। उन्होंने एक भव्य भोजन का आयोजन किया। वे अभिमान वश होकर कैलाश पर गए और शिव जी को परिवार समेत, समस्त देवता गण, यक्ष और गंधर्व सहित भोज में शामिल होने का न्योता दिया। साथ ही कहा कि वे सभी को तृप्त करके ही भेजेंगे। शिव जी को सब कुछ ज्ञात हो गया, उन्होंने कुबेर जी का अहंकार तोड़ने के लिए कहा कि वे और पार्वती जी तो नहीं आ सकते परंतु अपने पुत्र गणेश को अवश्य भेज देंगे।
आयोजन वाले दिन तय समय पर गणेश जी भोज में पहुंच गए। वहां पर पहुंचते ही गणेश जी ने कहा कि मुझे तेज भूख लगी है। सर्वप्रथम मुझे भोजन करवाएं। कुबेर जी ने सर्वप्रथम गणेश जी के लिए भोजन की थाली लगवा दी। गणेश जी ने खाना आरंभ कर दिया। वे एक के बाद एक व्यंजन खाने लगे, कुछ ही देर में सारे व्यंजन समाप्त होने लगे। यह सब देखकर कुबेर जी घबरा गए। सारे पकवान समाप्त होने के बाद गणेश जी ने और खाना मांगा। परंतु सारा भोजन समाप्त हो चुका था। उन्होंने अन्य चीजें खाना आरंभ कर दी। यह सब देखकर कुबेर जी समझ गए कि यह सब क्यों हो रहा है। उन्होंने अपनी भूल को स्वीकार करते हुए गणेश जी से क्षमा मांगी।