भारत में ऐसे कई चमत्कारी मंदिर हैं जहां पर कई तरह की रोचक कथाएं जरूर जुड़ी होगी। ऐसा ही एक मंदिर चेन्नई के चेंगलपेट्ट से 13 किमी दूर स्थित तिरूकल्लीकुण्ड्रम पक्षी तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि भगवान शिव के दर्शनार्थ हर रोज इस पर्वत पर गिद्धों का जोड़ा आता था। और भगवान शिव को भोग लगा प्रसाद इनको खिलाया जाता था। इस पर्वत पर स्थिति मंदिर में गिद्धों के जोड़ों के आने की परम्परा थी। पर्वत पर एक जगह पर मंदिर के पुजारी इन गिद्धों को दोपहर का भोजन कराते थे जिसमें चावल, गेहूं, घी और शक्कर होता था। पिछले एक दशक से इन गिद्धों का आना बंद हो गया है। कहा जाता है कि पापियों की संख्या बढ़ जाने की वजह से इनका आना रूका है।
मान्यता के अनुसार ये गिद्ध वाराणसी में गंगा में डूबकी लगाकर वहां से उड़कर यहां आते। दोपहर को मंदिर के पुजारी उनको भोजन कराते। फिर वे रामेश्वरम जाते और रात चिदम्बरम में बिताते। अगली सुबह उड़कर वे फिर वाराणसी जाकर गंगा स्नान करते। अंतिम बार जोड़े रूप में गिद्धों को 1998 में देखा गया। उसके बाद केवल एक गिद्ध यहां आता है।
पौराणिक कथा
कथा के अनुसार सदियों पहले चार गिद्धों के जोड़े थे। ये चार जोड़े आठ मुनियों के प्रतीक थे जिनको भगवान शिव ने शाप दिया था। हर एक युग में एक जोड़ा गायब होता चला गया। इस स्थल को उर्तरकोडि, नंदीपुरी, इंद्रपुरी, नारायणपुरी, ब्रह्मपुरी, दिनकरपुरी और मुनिज्ञानपुरी नाम से भी जाना जाता था। किंवदंती के अनुसार भारद्वाज मुनि ने भगवान शिव से दीर्घायु का वरदान मांगा ताकि वे चारों वेदों का अध्ययन कर सकें। भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और उनको वेद सीखने का वरदान दिया।
शिव ने इसके लिए तीन पर्वतों का निर्माण किया जो ऋग, यजुर व साम वेद के प्रतीक है। जबकि अथर्ववेद रूपी पर्वत से वे स्वयं प्रकट हुए। शिव ने हाथ में मिट्टी लेते हुए समझाया कि प्रिय भारद्वाज वेदों का अध्ययन मेरे हाथ की मिट्टी और खड़े पर्वतों की तरह है। अगर वेद सीखने के लिए तुम दीर्घायु होना चाहते हो लेकिन यह समझ लो कि सीखने का क्रम कभी समाप्त नहीं होता और इससे मोक्ष की प्राप्ति भी नहीं होती।
भगवान ने उपदेश दिया कि कलियुग में भक्ति से ही मोक्ष संभव है। यह मान्यता है कि वेदगिरिश्वरर का जो मंदिर जिस पर्वत पर है वह वेदों का स्वरूप है। इस वजह से शिव की आराधना वेदगिरिश्वरर के रूप में होती है जिसका आशय वेद पर्वतों के अधिपति हैं। इस पर्वत को पवित्र माना गया है और इसकी भी परिक्रमा की जाती है।