पहली बार जूना और अग्नि से अलग प्रयागराज कुंभ पर्व में बृहस्पतिवार को शंभूपंचदशनाम आवाहन अखाड़े ने धूमधाम से अलग पेशवाई निकली। नैनी स्थित मड़ौका मुख्यालय से खिचड़ी प्रसाद खाकर नागाओं की फौज के साथ चले संत, महामंडलेश्वर नए यमुना पुल से बैरहना और वहां से परेड मैदान, कुंभ मेला दफ्तर के सामने से पांटून पुल होते हुए सेक्टर सोलह स्थित अखाड़े की छावनी में पहुंचे।
हाथी, घोड़े तथा नागा संन्यासियों की फौज के साथ पेशवाई में कई दर्जन बैंडबाजे शामिल थे, जिन्होंने गंगा गीतों के साथ तरह-तरह के फिल्मी भजन सुनाकर समा बांधा। अखाड़े के इष्टदेव सिद्ध गणेश भगवान, देवता सूर्यप्रकाश की अगुवाई में तकरीबन तीन दर्जन से ज्यादा सुसज्जित रथों पर महामंडलेश्वर, श्रीमहंत साधुओं, शिष्यों के साथ विराजमान रहे। मड़ैका से लेकर कुंभ पर्व की छावनी तक पेशवाई निकलने वाले मार्ग के दोनों ओर श्रद्धालु स्वागत में खड़े रहे। कुंभ मेला क्षेत्र में पहुंचने पर कुंभ मेला अधिकारी विजय किरन आनंद और डीआईजी कुंभ मेला कविंद्र प्रताप सिंह सहित प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों ने माल्यार्पण करके संतों का स्वागत किया।
अखाड़े के महासचिव श्रीमहंत सत्यगिरि की देखरेख में निकली पेशवाई में रमतापंच के श्रीमहंत अवधूत गिरि, श्रीमहंत अमरीश भारती, श्रीमहंत रसराज पुरी, श्रीमहंत सोमगिरि, श्रीमहंत कैलाशपुरी, श्रीमहंत प्रयागभारती, श्रीमहंत थानापति भानगिरि, श्रीमहंत थानापति मनोहर गिरि सहित बड़ी संख्या संत, संन्यासी, श्रद्धालु शामिल हुए।
आवाहन अखाड़े की पेशवाई जब सेक्टर-16 स्थित छावनी में पहुंची तो संतों ने सबसे पहले धर्मध्वजा की पूजा और परिक्रमा की। इसके बाद अखाड़े के महासचिव श्रीमहंत सत्यगिरि जी की देखरेख में धर्मध्वजा और देवता के सामने ‘पुकार’हुई। इसके तहत अखाड़े के महामंडलेश्वरों, श्रीमहंतों, संतों ने अखाड़े को आर्थिक सहयोग स्वरूप अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु महाराज के चरणों में ‘भेंट’ किया।
आवाहन की परंपरा के मुताबिक अखाड़े से जुड़े सात महामंडलेश्वरों में से महामंडलेश्वर कृष्णानंद पुरी, करुणानंद गिरि, बाल योगेश्वरानंद गिरि ही पेशवाई में शामिल हो सके। वहीं किन्हीं कारणों से आचार्य महामंडलेश्वर शिवेंद्र गिरि नहीं आ सके।
आवाहन अखाड़े की पेशवाई में महिला संतों की भी भागीदारी रही। इसके तहत पेशवाई में श्रीमहंत लाभू गिरि, श्रीमहंत पूनम गिरि, श्रीमहंत सीमा गिरि (छोटू महाराज), श्रीमहंत वैष्णवी गिरि, श्रीमहंत मनीष गिरि, श्रीमहंत मंजू गिरि आदि शामिल थीं।