आषाढ़ शुक्ल एकादशी 30 जून को है। इस एकादशी को देवशयन एकादशी कहते हैं क्योंकि भगवान विष्णु इस दिन चार महीने के लिए अनंत शयन में जाते हैं। इसी दिन से चतुर्मास व्रत आरंभ हो जाता है।
शादी, जनेऊ, मुंडन जैसे शुभ काम इन महीनों में नहीं होते हैं। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार चतुर्मास पुण्य मास है इस मास में व्यक्ति को पुण्य संचय करना चाहिए। इस पुण्य से व्यक्त को स्वर्ग में स्थान मिलता है।
इस पुराण में कहा गया है कि चतुर्मास में व्यक्ति को झूठ, मांसाहार और स्त्री संसर्ग से दूर रहना चाहिए। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस मास में शाक, बैंगन, मूली, परवल नहीं खाएं। पलंग पर सोने की बजाय ज़मीन पर सोना चाहिए और सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
पुराणों के अनुसार चतुर्मास में व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। गायक और वाणी से संबंधित कार्यों को करने वाले व्यक्ति मीठी आवाज के लिए गुड़ का त्याग करें। जिन लोगों को शत्रुओं के कारण कष्ट हो रहा है उन्हें शत्रु पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए चतुर्मास के दौरान सरसों तेल नहीं खाना चाहिए। सौभाग्य की इच्छा रखने वालों को मीठे तेल का त्याग करना चाहिए।
पापों से मुक्ति एवं स्वर्ग प्राप्ति हेतु पुण्य कमाने के लिए के लिए दिन में बस एक बार भोजन करें। भोजन करने के लिए बर्तन की बजाय पत्तों का प्रयोग करें। जो लोग संतान पाने के इच्छुक हैं वह चतुर्मास के दौरान प्रतिदिन गाय का दूध पिएं।