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धनतेरस पर पंचमुखी हनुमानजी की पूजा से टलते हैं संकट, जानिए क्यों धारण किया हनुमानजी ने पंचमुखी स्वरूप

Fri, 13 Nov 2020 10:46 AM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
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हनुमान जी - फोटो : अमर उजाला
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वैसे तो चैत्र मास की पूर्णिमा को हनुमा जयंती मनाते हैं, लेकिन वाल्मिकी की रामायण में कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को हनुमान जयंती बताया गया है। इसलिए धनतेरस के दिन हनुमान जी की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। इस बार धनतेरस का त्योहार 13 नवंबर को मनाया जाएगा। तो चलिए जानते हैं पंचमुखी हनुमान के महत्व बारे में। हनुमान जी के इस स्वरुप की पूजा से साधक के सारे संकट टल जाते हैं। पंचमुखी हनुमान जी की साधना बहुत ही प्रभावशाली मानी जाती है। कथाओं के अनुसार महाभारतकाल में स्वयं भगवान कृष्ण ने पांडवों को पंचमुखी हनुमान की साधना करने के कहा था। अगर घर में पंचमुखी हनुमान जी की प्रतिमा या तस्वीर होती है तो मंगल, शनि और पितृदोष से भी मुक्ति मिलती है। घर से सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियां दूर चली जाती हैं। लेकिन पंचमुखी हनुमान जी की तस्वीर या प्रतिमा हमेशा दक्षिण दिशा में लगानी चाहिए। इनकी पूजा आराधना नियमपूर्वक करने से सारें संकटो का समाधान हो जाता है। जानते हैं कि हनुमान जी ने क्यो धारण किया पंचमुखी स्वरुप...

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इस वजह से पंचमुखी रूप किया धारण
हनुमान जी के पंचमुखी रूप धारण करने के पीछे एक पौराणिक कथा मिलती है। कथा के अनुसार जब भगवान राम के साथ युद्ध में रावण को अपनी हार का आभास होने लगा तो उसने अपने भाई अहिरावण से सहयता मांगी, अपने भाई रावण की सहयता करने के लिए अहिरावण ने अपने माया जाल से राम जी की पूरी सेना को सुला दिया, उसके बाद भगवान राम एवं लक्ष्मण को बंधक बनाकर पाताल लोक में ले गया। सभी को होश आने के बाद विभीषण अहिरावण की पूरी चाल को समझ गए। उन्होंने हनुमानजी को सारी बात बताई। जिसके बाद हनुमान जी राम और लक्ष्मण की खोज करते हुए  पाताल लोक जा पहुंच गए।
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यहां पर पहुंचने के बाद उन्होंने सबसे पहले मकरध्वज को हराया और फिर अहिरावण से युद्ध करने जा पहुंचे, परंतु अहिरावण ने 5 दिशाओं में दीए जलाए हुए थे, क्योंकि उसे वरदान था कि जो भी उन पांच दीपको को  एक साथ बुझा देगा वही उसका अंत कर पाएगा। इस परिस्थिति से निपटने के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया और पांचों दीए एक साथ बुझाकर अहिरावण का वध कर दिया। इन पंच मुखों में उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख और पूर्व दिशा में हनुमान मुख है। 
 
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