आज देव दीपावली है। दीपावली के 15 दिनों के बाद कार्तिक पूर्णिमा पर देव दिवाली का त्योहार मनाया जाता है। इस रात को वाराणसी के गंगा घाटों को दीयों की रोशनी से सजाया जाता है। वाराणसी में दिवाली का त्योहार दो बार मनाया जाता है। देव दिवाली पर पूरा शहर रौशनी से जगमगाया रहता है। देव दीपावली के दिन दीया जलाने की यह अनोखी परंपरा साल 1985 में पंचगंगा घाट पर शुरू की गई थी
भगवान शिव पधारते हैं धरती पर
देव दिवाली का जश्न बनारस में बड़ी ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। काशी भगवान शिव की नगरी है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नाम के राक्षस का वध किया था। त्रिपुरासुर के वध के बाद सभी देवी-देवताओं ने मिलकर खुशी मनाई थी। इस सभी देवी-देवता भगवान शंकर संग धरती पर आते हैं और दीप जलाकर खुशियां मनाते हैं। तभी से काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दिवाली मनाने की परंपरा सदियो से चली आ रही है। इस दिन दीपदान करने का विशेष महत्व होता है।
पूजा विधि
कार्तिक पूर्णिमा की शाम को गंगा का पूजन और भगवान की आरती के बाद घर, दुकान, गली, गंगा घाट और तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाना चाहिए।
शुभ मुहूर्त- देव दिवाली कार्तिक पूर्णिमा
शाम 5 बजकर 11 मिनट से 7 बजकर 48 मिनट तक।
महत्व
स्कंद पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है, वह यदि केवल इन तीन तिथियों में सूर्योदय से पूर्व स्नान करे तो भी पूर्ण फल का भागी हो जाता है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा, त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का बहुत महत्व बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और पापों का नाश होता हैं।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन महादेव ने प्रदोष काल में अर्धनारीश्वर के रूप में त्रिपुरासुर का वध किया।उसी दिन देवताओं ने शिवलोक यानि काशी में आकर दीपावली मनाई। तभी से ये परंपरा काशी में चली आ रही है।माना जाता है कि कार्तिक मास के इस दिन काशी में दीप दान करने से पूर्वजों को मुक्ति मिलती है। पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने धर्म, वेदों की रक्षा के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था।