भगवान विष्णु का प्रिय माह कार्तिक अपने समापन की ओर अग्रसर हो रहा है। पूरा कार्तिक माह देवता, मनुष्य, नाग, यक्ष, गन्धर्व आदि भगवान श्रीविष्णु की आराधना करते हैं और पूर्णिमा को दीपदान करके आरती करते हैं। इसे देवों की दीपावली भी कहा जाताहै। कार्तिक माह का एक-दिन श्री विष्णु और कार्तिकेय जी को समर्पित है। मां श्रीमहालक्ष्मी इसी माह पृथ्वी पर आती हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा भी इस माह की शुक्लपक्ष की एकादशी को टूटती है। सभी ऋषि, मुनि, योगियों-सन्यासियों का चातुर्मास्य व्रत भी कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को जगतगुरु विष्णु के पूजन के साथ संपन्न होता है।
कार्तिक माह की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को शास्त्रों ने अति पुष्करिणी कहा है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान नहीं कर पाता है वह इन्हीं तीन तिथियों में प्रातः काल स्नान करके पूर्णफल का भागी हो जाता है। त्रयोदशी को स्नानोपरांत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद सभी प्राणियों के पास जाकर उन्हें पवित्र करते हैं। चतुर्दशी के दिन समस्त देवी-देवता एवं यज्ञ सभी जीवों को पावन बनाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को स्नान अर्घ्य, तर्पण, जप-तप, पूजन, कीर्तन, दान-पुन्य करने से स्वयं भगवान विष्णु पृथ्वी के समस्त प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य कृत्या-कृत्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं। इन तीन दिनों में भगवतगीता एवं श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा का श्रवण, गीतापाठ विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करने से प्राणी पापमुक्त होकर निर्मलचित्त हो जाता है।
वह श्रीलक्ष्मी की कृपा से अपने ऊपर बढ़े हुए कर्ज से मुक्त होकर श्रीविष्णु जी की कृपा पाता है। कार्तिक माह की इन्हीं तिथियों में पुण्य का उदय होता है। इन दिनों में झूठ बोलना, चोरी-ठगी करना, धोखा देना, जीव हत्या करना, गुरु की निंदा करने व मदिरापान करने से बचना चाहिए।
एकादशी से पूर्णिमा तक के मध्य भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए खुले आसमान में दीप जलाते हुए नारायण के इस मंत्र-
'दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च । नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम् ।।
अर्थात- मैं सर्वस्वरूप एवं विश्वरूपधारी भगवान दामोदर को नमस्कार करके यह आकाशदीप अर्पित करता हूँ जो भगवान को अतिप्रिय है । साथ ही इसमंत्र का 'नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे । नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नमः ।। उच्चारण करते हुए पितरों को नमस्कार है, प्रेतों को नमस्कार है धर्म स्वरूप विष्णु को नमस्कार है, यमराज को नस्कार है तथा जीवन यात्रा के दुर्गम पथमें रक्षा करने वाले भगवान रूद्र को नमस्कार है । का उच्चारण करते हुए आकाशदीप जलाएं ।