सनातन धर्म बहुत ही व्यापक धर्म है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार 33 कोटि देवी-देवातओं के बारे में जिक्र मिलता है। इन सभी देवी-देवातओं से जुड़ी अपनी पौराणिक कथाएं और मान्यताएं हैं। प्रकृति में संतुलन व सृष्टि को सुचारु रुप से क्रियान्वित करने के लिए प्रत्येक देवी-देवता के अलग कार्य और कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। सभी देवों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सबसे प्रमुख माना जाता है। जहां भगवान शिव देवों के देव महादेव कहलाते हैं तो वहीं ब्रह्मा जी इस सृष्टि के रचियता है। भगवान श्री हरि विष्णु को जगत के पालन का कर्तव्य प्राप्त है, इसलिए इन्हें जगतपालनहारा कहा जाता है। प्रत्येक एकादशी का व्रत भी भगवान विष्णु को समर्पित होता है। हर वर्ष आषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी के बाद से कोई भी शुभ मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि करना वर्जित हो जाता है और इसके चार माह के उपरांत देवउठनी या देवोत्थान एकादशी से पुनः मांगलिक कार्यों आरंभ हो जाते हैं। इन चार माह की अवधि को चतुर्मास कहा जाता है। चतुर्मास के दौरान जहां मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है तो वहीं यह समय पूजा-पाठ और संयम रखने का माना गया है। तो आइए जानते हैं कि कब से कब तक हैं चतुर्मास, क्या है महत्व और इस दौरान क्यों वर्जित रहते हैं मांगलिक कार्य।