आत्माओं के बारे में आपने सुना होगा कि कुछ अच्छी आत्मा होती है तो कुछ बुरी भी आत्मा होती है। बुरी आत्मा वह होती हैं जिनकी मृत्यु किसी कारण से असमय हो जाती है और वह मुक्ति नहीं मिलने के कारण असंतुष्ट रहती है।
ऐसी आत्माएं दूसरों को परेशान करती हैं साथ ही अपने परिजनों को सबसे अधिक परेशान करती हैं क्योंकि इनकी मुक्ति परिजनों के श्राद्घ से ही संभव है।
इसलिए परिवार में किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो जाए या किसी की आत्मा भटक रही हो तो उनका श्राद्घ उत्तराखंड की उस भूमि में करें जहां भगवान विष्णु का निवास है और जहां से भगवान शिव ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए।
यहां आकर प्रेत योनी से मुक्ति मिल जाती है
पुराणों में बताया गया है कि उत्तराखंड की धरती पर भगवान बद्रीनाथ के चरणों में बसा है ब्रह्म कपाल। अलकनंदा नदी ब्रह्मकपाल को पवित्र करती हुई यहां से प्रवाहित होती है।
इस स्थान के विषय में मान्यता है कि इस स्थान पर जिस व्यक्ति का श्राद्ध कर्म होता है उसे प्रेत योनी से तत्काल मुक्ति मिल जाती है और भगवान विष्णु के परमधाम में उसे स्थान प्राप्त हो जाता है।
जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु होती है उसकी आत्मा व्याकुल होकर भटकती रहती है। ब्रह्म कपाल में अकाल मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध करने से आत्मा को तत्काल शांति और प्रेत योनी से मुक्ति मिल जाती है।
भगवान शिव को भी मजबूर होकर आना पड़ा ब्रह्मकपाल
ब्रह्म कपाल के विषय में कथा है कि एक समय ब्रह्मा जी के एक मुख ने झूठ बोला। शिव जी इससे क्रोधित हुए और ब्रह्मा जी का वह सिर काट दिया जिसने झूठ बोला था। इसके बाद ब्रह्मा जी के चार सिर रह गये।
कटा हुआ सिर शिव जी के हाथ से चिपक गया। लाख प्रयत्न करने पर भी ब्रह्म हत्या के दोष के कारण शिव जी के हाथ से ब्रह्मा जी का सिर अलग नहीं हुआ।
शिव जी संपूर्ण ब्रह्माण्ड में भटकते हुए बद्रीनाथ के पास एक समतल शिलाखंड पर जैसे ही पहुंचे उनके हाथ से चिपका हुआ ब्रह्मा जी का सिर छिटक कर अलग हो गया। इस समय से ही इस स्थान का नाम ब्रह्म कपाल पड़ गया।
शिव जी ने इस स्थान को वरदान दिया कि यहां पर जो व्यक्ति श्राद्ध करेगा उसे प्रेत योनी में नहीं जाना पड़ेगा एवं उनके कई पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिल जाएगी।
इसलिए पाण्डवों को भी आना पड़ा था ब्रह्मकपाल
भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत युद्घ समाप्त होने के बाद पाण्डवों को ब्रह्मकपाल में आकर पितरों का श्राद्घ करने का निर्देश दिया था। इसका कारण यह था कि महाभारत युद्घ में लाखों की संख्या में लोगों की मृत्यु हुई थी। कई लोगों का विधि पूर्वक अंतिम संस्कार भी नहीं हो पाया था।
ऐसे में अतृप्त आत्माओं को संतुष्ट करना आवश्यक हो गया था। इसलिए भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा मानकर पाण्डव बद्रीनाथ की शरण में आए और ब्रह्मकपाल में पितरों एवं युद्घ में मारे गए व्यक्तियों के लिए श्राद्घ किया।
इससे अकाल मृत्यु के कारण प्रेत योगी में गए पितरों को मुक्ति मिल गई और पाण्डव कुशलता पूर्वक हस्तिनापुर साम्राज्य का संचालन करने में सफल हुए।
पढ़ें,श्राद्घ पक्ष में नहीं करें ऐसी गलती क्रोधित पितर देंगे शाप
पढ़ें,क्यों मरते समय किसी व्यक्ति की आंखें उलट जाती है?