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अंग दान और परलोकः शास्त्र की पांच बातें

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शास्त्रों में अंग दान करने वाले के साथ मृत्यु के बाद क्या होता है और अगले जन्म में उसकी क्या स्थिति होगी उसका कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता है।
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अथर्वेद जिससे आयुर्वेद का जन्म हुआ उसमें भी कहीं अंग दान को लेकर ऐसा जिक्र नहीं किया गया है कि अंग दान करने से व्यक्ति को मोक्ष मिलने में बाधा आती है या अगले जन्म में उसे वह अंग नहीं मिलता है।

इसलिए यह धारणा कि अंग दान करने से अगले जन्म में व्यक्ति के पास वह अंग नहीं होता है? व्यक्ति को परलोक में और अगले जन्म में कष्ट भोगना पड़ता है पूरी तरह से गलत है। शास्त्रों और पुराणों के जानकार पं. जयगोविंद शास्त्री बताते हैं कि अंग दान करने से व्यक्ति को परलोक में कष्ट नहीं बल्कि उत्तम लोक मिलता है।
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शास्त्रों और पुराणों में कई ऐसी कथाएं मिलती हैं जिसमें बताया गया है कि अंग दान करने वाले को देवताओं के समान आदर और पद प्राप्त हुआ।

अंग दान करने वालों के लिए क्या कहता है शास्त्र

शास्त्रों में अंग दान करने वाले के साथ मृत्यु के बाद क्या होता है और अगले जन्म में उसकी क्या स्थिति होगी उसका कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

अथर्वेद जिससे आयुर्वेद का जन्म हुआ उसमें भी कहीं अंग दान को लेकर ऐसा जिक्र नहीं किया गया है कि अंग दान करने से व्यक्ति को मोक्ष मिलने में बाधा आती है या अगले जन्म में उसे वह अंग नहीं मिलता है।

इसलिए यह धारणा कि अंग दान करने व्यक्ति को परलोक में और अगले जन्म में कष्ट भोगना पड़ता है पूरी तरह से गलत है। शास्त्रों और पुराणों के जानकार पं. जयगोविंद शास्त्री बताते हैं कि अंग दान करने से व्यक्ति को परलोक में कष्ट नहीं बल्कि उत्तम लोक मिलता है।

शास्त्रों और पुराणों में कई ऐसी कथाएं मिलती हैं जिसमें बताया गया है कि अंग दान करने वाले को देवताओं के समान आदर और पद प्राप्त हुआ।

अंग दान करने वाले को स्वर्ग या नर्क

अंग दान करने वाले को म‌िलता है स्वर्ग या नर्क इसका सबसे बड़ा उदाहरण द‌िया गया है राजा श‌िव‌ि की कथा में। एक थे राजा शिवि। इनके धार्मिक स्वभाव और दयालुता एवं परोपकार के गुण की ख्याति स्वर्ग में भी पहुंची। इन्द्र और अग्नि देव ने योजना बनायी कि राशि शिवि के गुणों को परखा जाए। एक दिन अग्नि देव कबूतर बने और इन्द्र बाज। कबूतर उड़ता हुआ राजा शिवि की गोद में आकर बैठ गया और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगा।

इसी बीच बड़ा सा बाज राजा शिवि के पास पहुंचा और कबूतर को वापस करने की मांग करने लगा। बाज ने कहा कि, कबूतर मेरा आहार है अगर आप मुझे वापस नहीं करेंगे तो आपको मुझे भूखा रखने का पाप लगेगा।

बाज की बातों को सुनकर राजा शिवि ने कहा कि कबूतर मैं तुम्हें नहीं दूंगा अगर कोई अन्य उपाय है तो बताओ। बाज ने कहा कि कबूतर के मांस के बराबर मुझे मांस दे दीजिए इससे मेरा काम हो जाएगा। राजा ने विचार किया कि एक जीव को बचाने के लिए दूसरे जीव को कष्ट देना पाप होगा।

यही सोचकर राजा ने कबूतर को तराजू के एक पलड़े में डाल दिया और अपने शरीर से मांस काटकर दूसरे पलड़े में रखने लगे। लेकिन काफी मांस रखने के बाद भी पलड़ा हिला तक नहीं। अंत में राजा शिव‌ि स्वयं दूसरे पलड़े पर बैठ गए और उन्होंने बाज से कहा कि तुम मुझे खाकर अपनी भूख शांत कर लो।

राजा की इस दयालुता और शरण में आए हुए कि मदद करने की भावना को देखकर कबूतर बने अग्नि देव और बाज  बने देवराज इन्द्र अपने वास्तव‌िक रूप में प्रकट हुए। आसमान से फूलों की वर्षा होने लगी। देवराज इन्द्र ने कहा कि तुम ने धर्म की लाज रखी है। जो शरण में आए की रक्षा नहीं करता वह पापी है। अपने शरीर का मांस और फ‌िर पूरा देह दान करने के कारण राजा श‌िव‌ि को मोक्ष की प्राप्त‌ि हुई।

इनकी हड्ड‌ियों का दान बना दुन‌िया के ल‌िए वरदान

ऋग्वेद की कथा के अनुसार वृत्रासुर नाम के एक राक्षस ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। देवताओं ने देवलोक की रक्षा के लिए वृत्रासुर पर अपने दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया लेकिन सभी अस्त्र शस्त्र इसके कठोर शरीर से टकराकर टुकड़े-टुकड़े हो रहे थे। अंत में देवराज इन्द्र को अपने प्राण बचाकर भागना पड़ा। इन्द्र भागकर ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के पास गया लेकिन तीनों देवों ने कहा कि अभी संसार में ऐसा कोई अस्त्र शस्त्र नहीं है जिससे वृत्रासुर का वध हो सके।

देवराज की दयनीय स्थिति देखकर भगवान शिव ने कहा कि पृथ्वी पर एक महामानव हैं दधिचि। इन्होंने तप साधना से अपनी हड्डियों को अत्यंत कठोर बना लिया है। इनसे निवेदन करो कि संसार के कल्याण हेतु अपनी हड्डियों का दान कर दें।

इन्द्र ने शिव की आज्ञा के अनुसार दधिचि से हड्डियों का दान मांगा। महर्षि दधिचि ने संसार के हित में अपने प्राण त्याग दिए। देव शिल्पी विश्वकर्मा ने इनकी हड्डियों से इंद्र के लिए वज्र नामक अस्त्र का निर्माण किया और दूसरे देवताओं के लिए भी अस्त्र शस्त्र बनाए।

इन्द्र ने वृत्रासुर पर वज्र का प्रहार किया जिससे टकराकर वृत्रासुर का शरीर रेत की तरह बिखर गया। देवताओं का फिर से देवलोक पर अधिकार हो गया और संसार में धर्म का राज कायम हुआ।

प‌िता के ल‌िए बेटे ने क‌िया ऐसा दान सोच भी नहीं सकते

पुराणों में कथा म‌िलती है क‌ि एक राजा थे जिनका नाम था ययात‌ि। ययात‌ि की मुलाकात एक घटना क्रम में असुरों के गुरू शुक्राचार्य की बेटी देवयानी से होती है। देवयानी और ययात‌ि एक दूसरे पर मोह‌ित हो जाते हैं और व‌िवाह कर लेते हैं।

देवयानी और ययात‌ि के व‌िवाह से शुक्राचार्य क्रोध‌ित होते हैं और ययात‌ि को शाप देते हैं क‌ि तुम वृद्धावस्‍था को प्राप्त हो जाओ। इस शाप से दुखी होकर ययात‌ि ने शुक्राचार्य से व‌िनती करने लगे क‌ि आपकी पुत्री से भोग करते हुए अभी मेरी तृप्त‌ि नहीं हुई है साथ ही इस शाप से आपकी पुत्री को भी कष्ट होगा।

ययात‌ि की व‌िनती को सुनकर शुक्राचार्य ने कहा क‌ि अगर कोई तुम्हें अपना यौवन दान कर देता है तो तुम फ‌िर से युवा हो सकते हो। ययात‌ि ने अपने सभी पुत्रों से यौवन दान में मांगा लेक‌िन कोई भी अपना यौवन दान करने के ल‌िए तैयार नहीं हुआ। अंत में जब ययात‌ि ने अपने छोटे बेटे पुरू से यौवन दान मांगा तो वह प‌िता के ल‌िए यौवन दान करने के ल‌िए तैयार हो गया।

इस दान को पाकर ययात‌ि ने लंबे समय तक भोग व‌िलास क‌िया और फ‌िर भी भोग से तृप्त‌ि नहीं होने पर ययात‌ि का आत्मज्ञान जग उठा और उन्होंने पुरू को उसका यौवन वापस कर द‌िया। राजा ययात‌ि ने पुरू की प‌िता के प्रत‌ि समर्पण और दान को देखते हुए अपना सारा राज पाट उन्हें सौंप द‌िया। इसी पुरू के वंश में भीष्म, पांडव और धृतराष्ट्र का जन्म हुआ था ज‌िनके पुत्रों ने महाभारत का युद‍्ध क‌िया।
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तब भगवान व‌िष्‍णु ने क‌िया आंखों का दान

अंग दान का सबसे बड़ा उदाहरण भगवान व‌िष्‍णु का है। भगवान व‌िष्‍णु न‌ियम‌ित 108 कमल फूलों से श‌िव जी की पूजा क‌िया करते थे। एक द‌िन जब भगवान वष्णु पूजा कर रहे थे तब श‌िव जी के मन में व‌िष्‍णु भगवान की परीक्षा लेने का व‌िचार आया और उन्होंने एक फूल गायब कर द‌िया।

जब भगवान व‌िष्‍णु ने एक फूल कम पाया तब उन्होंने सोचा क‌ि संसार उन्हें कमल नैन कहता है यानी उनकी आंखें कमल के समान है। यही व‌िचार कर व‌िष्‍णु भगवान ने अपनी आंखों को श‌िव ल‌िंग पर अर्प‌ित करने का व‌िचार क‌िया और जैसे ही अपनी आंख न‌िकालने लगे तभी श‌िव जी प्रकट हो गए और व‌िष्‍णु भगवान को वरदान स्वरूप सुदर्शन चक्र भेंट किया।

यानी शास्‍त्रों और पुराणों में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जो बताते हैं क‌ि अंग दान महादान है। अंग दान से दोष नहीं महापुण्य म‌िलता और परलोक में उत्तम स्‍थान और अगले जन्म में उत्तम कुल प्राप्त होता है।
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