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इस एकादशी व्रत से मिलता है अश्वमेध यज्ञ करने का फल

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पुराणों में बताया गया है कि भाद्र मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी बड़ी ही पुण्यदायिनी है। इसे अजा एकादशी के नाम से जाना जाता है। जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखता है उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं।
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इस एकादशी के विषय में मान्यता है कि दान में अपना राज पाट गंवाने के बाद जब राजा हरिश्चन्द्र एक श्मशान में नौकरी करने लगे।

एक दिन गौतम मुनि की सलाह पर हरिश्चन्द्र ने यह एकदशी व्रत किया जिसके पुण्य से उन्हें अपना खोया हुआ राज पाट एवं पत्नी और पु़त्र का साथ मिला।
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अजा एकादशी व्रत विधि

यह पुण्यदायिनी एकादशी व्रत इस वर्ष 21 अगस्त को है। एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय के समय स्नान ध्यान करके भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक जलाकर, फलों तथा फूलों से भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। भगवान की पूजा के बाद विष्णु सहस्रनाम अथवा गीता का पाठ करना चाहिए।

व्रती के लिए दिन में निराहार एवं निर्जल रहने का विधान है। लेकिन शास्त्र यह भी कहता है कि बीमार और बच्चे फलाहार कर सकते हैं।

सामान्य स्थिति में रात्रि में भगवान की पूजा के बाद जल और फल ग्रहण कर सकते हैं। इस व्रत में रात्रि जागरण करने का बड़ा महत्व है। द्वादशी तिथि के दिन प्रातः ब्राह्मण को भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। यह ध्यान रखें कि द्वादशी के दिन बैंगन नहीं खाएं।
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अजा एकादशी व्रत करने का लाभ

पुराणों में बताया गया है कि जो व्यक्ति श्रद्घापूर्वक अजा एकादशी का व्रत रखता है उसके पूर्व जन्म के पाप कट जाते हैं। व्रत के पुण्य से इस जन्म में सुख-समृद्घि की प्राप्ति होती है।

भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि अजा एकादशी के व्रत से अश्वमेघ यज्ञ करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवान श्री रामचन्द्र ने अपने जीवन काल में यह यज्ञ किया था। इसी यज्ञ से उन्हें लव कुश से मिलने का अवसर मिला था। व्रत के पुण्य से व्यति मृत्यु के पश्चात उत्तम लोक में स्थान प्राप्त करता है।
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