हिंदू-मुस्लिम पक्षों में तनाव
इसके बाद साल 1880 के मध्य में जब हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा की वजह से दोनों पक्षों में मुठभेड़ हुई जिसके बाद किशन दास गुरवाला बाग में आयोजित होने वाले तारवाला ईद मिलन मेले का आयोजन बंद हो गया, लेकिन दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित होने के बाद इस मेले को एक बार फिर शुरू कर दिया गया. लेकिन इसके चालीस साल बाद 1920 में दोनों पक्षों में एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द संकट में पड़ गया और जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के संस्थापकों में शामिल हाकिम अजमल ख़ान की कोशिशों का भी असर न हुआ.
कुछ लोग सोचते हैं कि 1926 में महान चिकित्सक हाकिम अजमल ख़ान की मौत की वजह भी यही रही कि उनके क़द को बड़ा नुकसान हुआ जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सके. बकरीद और ईद-उल-अज़हा से जुड़ी एक और चीज़ ये है कि औरंगजेब के दौर में ऊंचे स्थान पर बनी ईदगाह के आसपास सबसे ज़्यादा क़ुर्बानियां दी गईं. कुछ लोग आज भी ये कहते हैं कि क़ुर्बान अली की आत्मा सुकून में होगी क्योंकि राजधानी दिल्ली में किसी गाय की क़ुर्बानी नहीं दी जाती है. बिडंवना ये है कि लाला चुन्ना मल का नाम अभी ज़िंदा है जबकि क़ुर्बान अली का नाम लगभग भुलाया जा चुका है.