शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गणेश के मिट्टी से जुड़ाव का एक प्रमाण यह भी है कि किसी भी मंदिर, घर या दुकान में गणेश की मूर्ति रखते समय यह ध्यान देना होता है कि उनके पैर जमीन का निश्चित रूप से स्पर्श करें। यदि उनके पैर भूमि से सटे न हों, तो अनिष्ट की आशंका होती है। प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक होने के कारण वह एक मासूम, शक्तिशाली, योद्धा, विद्वान, कल्याणकारी, शुभ-लाभ और कुशल-क्षेम के दाता हैं।
गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान। उन्हें आदिदेवता, देवताओं में प्रथम पूज्य और आदिपूज्य भी कहा गया है। इसका अर्थ है कि प्रकृति पहले, बाकी तमाम शक्तियां और उपलब्धियां उसके बाद। हिंदू धर्म और संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ करने के पहले 'श्री गणेशाय नमः' कहने और लिखने की परंपरा है। हमारे पूर्वजों द्वारा गणेश के इस अद्भुत रूप की कल्पना संभवतः यह बताने के लिए की गई है कि प्रकृति को सम्मान देकर और उसकी शक्तियों से सामंजस्य बैठाकर मनुष्य शक्ति, बुद्धि, कला, संगीत, सौंदर्य, भौतिक सुख, लौकिक सिद्धि, दिव्यता और आध्यात्मिक ज्ञान सहित कोई भी उपलब्धि हासिल कर सकता है। यही कारण है कि संपति, समृद्धि तथा सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी और ज्ञान, कला तथा संगीत की देवी सरस्वती की पूजा भी गणेश के बिना पूरी नहीं मानी जाती है।
गणेश को भुलाने का असर प्रकृति के साथ-साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ा है। आज प्रकृति अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से रूबरू है और इस संकट में हम उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरूप को समझना और पाना है, तो उसके लिए असंख्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। गणेश हमारे भीतर हैं। प्रकृति, पर्यावरण और जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर ही हम अपने भीतर के गणेश को जगा सकते हैं।