बैसाखी का महत्व
बैसाखी के दिन ही सिखों के दसवें गुरू गुरु गोबिंद सिंह ने सन् 1699 में पवित्र खालासा पंथ की स्थापना की थी। गुरु गोविंद सिंह जी को उनके साहस और शौर्य के लिए जाना जाता है। गुरू गोबिंद सिंह जी ने लोगों में अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने और उनमें साहस भरने का बीडा़ उड़ाया। उन्होंने आनंदपुर में सिखों का संगठन बनाने के लिए लोगों का आवाह्न किया और इसी सभा में उन्होंने तलवार उठाकर लोगों से पूछा कि वे कौन बहादुर योद्धा हैं तब उनमें से एक व्यक्ति निकलकर आया गुरु गोविंद सिंह जी उन्हें अपने साथ पंडाल में ले गए और रक्त से सनी हुई तलवार लेकर वापस आए और दोबारा वापस आकर यही सवाल किया तो फिर से एक सेवक आया, इसी तरह से एक एक करके पांच लोग सामने आए जो पंज प्यारे कहलाए। इन्हें खालसा पंथ का नाम दिया गया।
कैसे मनाई जाती है बैसाखी
बैसाखी वाले दिन लोग सुबह जल्दी उठकर गुरूद्वारे में जाकर प्रार्थना करते हैं।
गुरुद्वारे में गुरुग्रंथ साहिब जी के स्थान को जल और दूध से शुद्ध किया जाता है और गुरु वाणी सुनी जाती है।
इस दिन श्रद्धालुओं के लिए विशेष प्रकार का अमृत तैयार किया जाता है जिसे लोगों में वितरित किया जाता है। लोग एक पंक्ति में लगकर अमृत को पाँच बार ग्रहण करते हैं।
अपराह्न के समय अरदास होती है और बाद प्रसाद को गुरु को चढ़ाया जाता है इसके बाद उसका वितरण किया जाता है।
इसके बाद सबसे अंत में लंगर चखा जाता है।