महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य के रणकौशल से पांडव-सेना के बड़े-बड़े महारथी भी चिंतित हो उठे थे। उनके दिव्यास्त्रों के प्रयोग से पांडवों की पूरी सेना विचलित हो रही थी। आचार्य के हाथ में शस्त्र रहते, तो उन्हें कोई भी पराजित कर नहीं सकता। वह स्वयं शस्त्र रख दें, तभी उन्हें रोकना संभव है। युद्ध के शुरू में उन्होंने स्वयं बताया था कि कोई अत्यंत अप्रिय समाचार किसी भरोसेमंद व्यक्ति से सुनाई दे, तो शस्त्र त्यागकर ध्यान करने लगेंगे।
कृष्ण ने यह बात पांडवों को याद दिलाई। यह सुनकर भीमसेन को एक उपाय सूझा। वह द्रोणपुत्र अश्वत्थामा से युद्ध करने लगे। युद्ध करते-करते भीम ने अश्वत्थामा को युद्धभूमि से बहुत दूर फेंक दिया। युद्ध में एक अश्वत्थामा नाम का हाथी भी था। भीम ने उसे मार दिया और द्रोणाचार्य के सामने जाकर बोला, ‘अश्वत्थामा मारा गया।’