अपरा एकादशी शुभ मुहूर्त
- ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि आरंभ- 05 जून प्रातः 04 बजकर 07 मिनट से
- ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि समाप्त- 06 जून प्रातः 06 बजकर 19 मिनट पर
- एकादशी व्रत पारण समय- 07 जून सुबह 05 बजकर 23 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 10 मिनट तक
- द्वादशी तिथि समाप्त- 7 जून सुबह 08 बजकर 10 मिनट पर
- ब्रह्म मुहूर्त- तड़के 03 बजकर 34 मिनट से सुबह 04 बजकर 16 मिनट तक।
- अभिजित मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 19 मिनट से दोपहर 12 बजकर 14 मिनट तक।
- विजय मुहूर्त- दोपहर 02 बजकर 03 मिनट से दोपहर 02 बजकर 58 मिनट तक।
- गोधूलि मुहूर्त- शाम 06 बजकर 23 मिनट से शाम 06 बजकर 47 मिनट तक।
- अमृत काल- शाम 06 बजकर 22 मिनट से रात 08 बजकर 10 मिनट तक।
- निशिता मुहूर्त- रात 11 बजकर 26 मिनट से 07 जून सुबह 12 बजकर 07 मिनट तक।
- सर्वार्थ सिद्धि योग- सुबह 05 बजकर 44 मिनट से 07 जून सुबह 02 बजकर 28 मिनट तक
अपरा एकादशी पर ग्रहों की स्थिति-
अपरा एकादशी के दिन चंद्रमा मेष राशि और सूर्य वृषभ राशि में विराजमान रहेगा। सूर्य नक्षत्र रोहिणी और नक्षत्र पद अश्विनी और भरणी रहेगा।
अपरा एकादशी महत्व
अपरा एकदाशी अत्यंत पुण्यदायिनी है। पद्मपुराण के अनुसार अपरा एकादशी का पुण्य व्यक्ति को पूरे जीवन के साथ मृत्यु के बाद भी प्राप्त होता है। यदि कोई प्रेत योनि में है तो उसे मुक्ति प्राप्त होती है और बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। इस व्रत के संबंध में भगवान श्री कृष्ण नें स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को बतलाया है कि यह व्रत बड़े-बड़े पातको का भी नाश करने वाला है।
अपरा एकादशी 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : Social media
अपरा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक राज्य में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। इसी कारण एक दिन अवसर पाकर उसने राजा की हत्या कर दी और राजा के शव को जंगल में एक पीपल के नीचे दबा दिया।
अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर बसेरा करने लगी। वह आत्मा इस मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को परेशान करने लगी। एक दिन ऋषि धौम्य इसी रास्ते से होकर गुजर रहे थे। जब इन्होंने प्रेत को देखा तो अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।
तब ऋषि ने राजा की प्रेतात्मा को पीपल के पेड़ से नीचे उतारा और उसे परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि धौम्य ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन व्रत पूर्ण होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य के प्रभाव से राजा को प्रेत योनि से मुक्ति प्राप्त हो गई और राजा नें ऋषि धौम्य को धन्यवाद दिया और बैकुंठ धाम को चले गए।
अपरा एकादशी 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : lord vishnu (demo pic)