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Apara ekadashi 2021: इस दिन है ज्येष्ठ माह की पहली एकादशी, जानिए महत्व, तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि समेत सब कुछ

Thu, 27 May 2021 06:26 PM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
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अपरा एकादशी 2021 - फोटो : Rohit Jha
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सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक शास्त्रों में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। प्रत्येक माह में दो एकादशी तिथि आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। इस तरह से पूरे वर्ष में 24 एकादशी तिथि आती हैं। हर एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है लेकिन हर एकादशी का अपना एक अलग महत्व और फल होता है। ज्येष्ठ मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इस बार अपरा एकादशी का व्रत 06 जून 2021 दिन रविवार को किया जाएगा। धार्मिक मान्यता अनुसार अपरा एकादशी का व्रत नियम और निष्ठा से करने से सभी पापों का नाश होता है। जानते हैं अपरा एकादशी व्रत का महत्व तिथि, शुभ मुहूर्त, शुभ योग, कथा समेत व्रत पूजा विधि। 

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अपरा एकादशी 2021
अपरा एकादशी शुभ मुहूर्त
  • ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि आरंभ- 05 जून प्रातः 04 बजकर 07 मिनट से
  • ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि समाप्त- 06 जून प्रातः 06 बजकर 19 मिनट पर 
  • एकादशी व्रत पारण समय- 07 जून सुबह 05 बजकर 23 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 10 मिनट तक
  • द्वादशी तिथि समाप्त- 7 जून सुबह 08 बजकर 10 मिनट पर
  • ब्रह्म मुहूर्त- तड़के 03 बजकर 34 मिनट से सुबह  04 बजकर 16 मिनट तक।
  • अभिजित मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 19 मिनट से दोपहर 12 बजकर 14 मिनट तक।
  • विजय मुहूर्त- दोपहर 02 बजकर 03 मिनट से दोपहर 02 बजकर 58 मिनट तक।
  • गोधूलि मुहूर्त- शाम 06 बजकर 23 मिनट से शाम 06 बजकर 47 मिनट तक।
  • अमृत काल- शाम 06 बजकर 22 मिनट से रात 08 बजकर 10 मिनट तक।
  • निशिता मुहूर्त- रात 11 बजकर 26 मिनट से 07 जून सुबह 12 बजकर 07 मिनट तक।
  • सर्वार्थ सिद्धि योग- सुबह 05 बजकर 44 मिनट से 07 जून सुबह 02 बजकर 28 मिनट तक 
अपरा एकादशी पर ग्रहों की स्थिति-
अपरा एकादशी के दिन चंद्रमा मेष राशि और सूर्य वृषभ राशि में विराजमान रहेगा। सूर्य नक्षत्र रोहिणी और नक्षत्र पद अश्विनी और भरणी रहेगा।

अपरा एकादशी 2021
अपरा एकादशी महत्व
अपरा एकदाशी अत्यंत पुण्यदायिनी है। पद्मपुराण के अनुसार अपरा एकादशी का पुण्य व्यक्ति को पूरे जीवन के साथ मृत्यु के बाद भी प्राप्त होता है। यदि कोई प्रेत योनि में है तो उसे मुक्ति प्राप्त होती है और बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। इस व्रत के संबंध में भगवान श्री कृष्ण नें स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को बतलाया है कि यह व्रत बड़े-बड़े पातको का भी नाश करने वाला है। 

अपरा एकादशी 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
अपरा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक राज्य में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। इसी कारण एक दिन अवसर पाकर उसने राजा की हत्या कर दी और राजा के शव को जंगल में एक पीपल के नीचे दबा दिया।

अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर बसेरा करने लगी। वह आत्मा इस मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को परेशान करने लगी। एक दिन ऋषि धौम्य इसी रास्ते से होकर गुजर रहे थे। जब इन्होंने प्रेत को देखा तो अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।

तब ऋषि ने राजा की प्रेतात्मा को पीपल के पेड़ से नीचे उतारा और उसे परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि धौम्य ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन व्रत पूर्ण होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य के प्रभाव से राजा को प्रेत योनि से मुक्ति प्राप्त हो गई और राजा नें ऋषि धौम्य को धन्यवाद दिया और बैकुंठ धाम को चले गए। 
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अपरा एकादशी 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : lord vishnu (demo pic)
अपरा एकादशी पूजा विधि-
  • एकादशी के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि करने के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान के समझ एकादशी व्रत का संकल्प करें। 
  • इसके बाद घर में एक स्वच्छ स्थान या फिर पूजा स्थान पर एक वेदी बनाएं और फिर कलश स्थापना करके इसमें आम या अशोक के पत्ते लगाएं।
  • अब वेदी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को विराजमान करें। 
  • इसके बाद भगवान विष्णु के समझ धूप-दीप प्रज्वलित करें और पीले फूल, ऋतुफल और तुलसी दल आदि से पूजन करें।
  • इसके बाद हाथ में पुष्प लेकर अपरा एकादशी व्रत का महातम्य पढ़ें। 
  • कथा पूर्ण होने के बाद पुष्ण विष्णु जी के चरणों में समर्पित कर दें और उनकी आरती उतारें। 
  • शाम के समय पुनः भगवान विष्णु की पूजा और आरती करें। 
  • रात्रि के समय भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।
  • द्वादशी तिथि यानी एकादशी के अगले दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात पूजन करें और  किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और यथा-शक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें। 
  • इसके बाद स्वयं भी भोजन कर व्रत का पारण करें।
  • एकदाशी व्रत का पारण हमेशा हरिवासर समाप्त होने के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए। 
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