आमलकी एकादशी व्रत की कथा
राजा मान्धाता के पूछने पर ऋषि वशिष्ठ ने आमलकी एकादशी व्रत का माहात्म्य बताते हुए कहा कि यह व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन होता है। इस व्रत के फल से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत को करने से एक हजार गायों को दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। आमलकी एकादशी पर (आंवले) की महत्ता उसके गुणों के कारण उसकी पूजा का विधान है इसके अतिरिक्त माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के श्रीमुख से हुई है।
कथा के अनुसार प्राचीन समय में वैदिक नामक एक नगर था। उस नगर में चैत्ररथ नामक चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। राजा उच्चकोटि का विद्वान होने के साथ ही बहुत धार्मिक प्रवृत्ति का था। राजा प्रत्येक एकादशी का व्रत किया करता था। उसके राज्य में सभी लोग एकदशी के व्रत का पालन और पूजन किया करते थे। इसी तरह उस राज्य में सभी सुख-शांति के साथ प्रसन्नता पूर्वक रहा करते थे। एक बार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी तिथि पर राजा और उसकी प्रजा में बालक, युवा और वृद्धजनों सभी ने प्रसन्नतापूर्वक अमालकी एकादशी का व्रत किया। इसके बाद अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर राजा ने कलश स्थापित करके धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न, छत्र आदि से पूजन किया। इसके बाद सभी लोग मंदिर में ही रात्रि जागरण करने लगे। रात के समय मंदिर में एक बहेलिया आया। वह बहेलिया अपने कुटुंब का पालन-पोषण जीव हिंसा (शिकार) करके किया करता था। उस समय वह भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल था। भोजन पाने की इच्छा से वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया। उस जगह बैठकर वह भगवान विष्णु की कथा तथा एकादशी माहात्म्य सुनने लगा। इस प्रकार उस बहेलिए ने सारी रात अन्य लोगों के साथ जागरण कर व्यतीत की। प्रात:काल सभी लोग अपने-अपने निवास पर चले गए। वह बहेलिया भी अपने घर चला गया और वहां जाकर भोजन किया।
अमालकी के प्रभाव से बहेलिए को मिला राजा का जन्म
कुछ समय पश्चात बहेलिए की मृत्यु हो गई। उसने जीव हिंसा की थी, इस कारण वह घोर नरक का भागी था परंतु उस दिन आमलकी एकादशी का व्रत तथा जागरण के प्रभाव से उसने राजा विदुरथ के यहां जन्म लिया। उसका नाम वसुरथ रखा गया। बड़ा होने पर वह चतुरंगिणी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस सहस्त्र ग्रामों का संचालन करने लगा। वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान तथा क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णुभक्त था।
एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलने गया। वह वन में रास्ता भटक गया और दिशा का ज्ञान न होने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। रात में वहां डाकू आए और राजा को अकेला सोता हुआ देखकर वसुरथ की ओर दौड़े। वे राजा को पहचान गए। वह डाकू कहने लगे कि इस दुष्ट राजा ने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि समस्त संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया। अब हमें इसे मारकर अपने अपमान का बदला लेना चाहिए। वे डाकू राजा पर टूट पड़े और हथियारों से प्रहार करने लगे परंतु डाकू जब भी अस्त्रों से राजा के ऊपर प्रहार करते वह फूल के समान हो जाते। आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुई। वह देवी अत्यंत सुंदर थी तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत थी। उसकी आंखों से क्रोध की भीषण लपटें निकल रही थी। उस देवी ने कुछ ही क्षणों में उन सभी डाकुओं का नाश कर दिया। जब राजा नींद से जागा तो उसने ने वहां अनेक डाकुओं को मृत देखा तो वह आश्चर्य होकर सोचने लगा किसने इन्हें मारा? इस वन में कौन मेरा हितैषी रहता है? राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कि तभी उसी समय वहां आकाशवाणी हुई 'हे राजन! यह सब आमलकी एकादशी के प्रभाव से हुआ है। इस संसार मे भगवान विष्णु के अतिरिक्त तेरी रक्षा कौन कर सकता है। इस आकाशवाणी को सुनने के पश्चात राजा ने भगवान विष्णु को स्मरण कर उन्हें प्रणाम किया, फिर अपने नगर को वापस आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा।