इलाहाबाद के आस
पास कर्ई तीर्थ स्थल है जिनका वर्णन पुराणों में किया गया
है। ऐसे ही कुछ तीर्थाों की यात्रा पर चलिए।
अक्षय वट
प्रयाग
में अक्षयवट की महिमा बहुत प्राचीन होने के साथ-साथ सर्वविदित है। यह
यमुना के किनारे किले की चहारदीवारी के अन्दर स्थित है। अग्निपुराण में कहा
गया है कि वटवृक्ष के निकट मरने वाला सीधे विष्णु लोक जाता है। सम्पूर्ण
संसार के प्रलय हो जाने पर या भस्म हो जाने पर भी वटवृक्ष नहीं नष्ट होता।
हंसकूप
गंगा
तट के पास हंस कूप है। मत्स्य पुराण में इस कूप का उल्लेख किया गया है।
वर्तमान में यह कूप जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। इस कूप के विषय में पुराण
में लिखा हैः-
हंस प्रपत्र हंसी हंस रूपी जगनाथः सहाय
तत्र स्नाने पाने हंस गति लभीत भीसे।
अर्थात
इस हंस रूपी बावली में स्नान करने एवं इसका जल पीने से अश्वमेध यज्ञ का फल
मिलता है। इस कूप में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
दुर्वासा आश्रम
श्रषि
दुर्वासा जो भगवान शिव के अंशावतार माने जाते हैं। इनका आश्रम त्रिवेणी
संगम से लगभग 9.5 किलोमीटर की दूरी पर ककरा गांव में स्थित है। मान्यता है
कि ऋषि दुर्वासा यहीं आश्रम बनाकर रहते थे।
लाक्षागृह
महाभारत
में दुर्योधन द्वारा पाण्डवों को लाख के घर में जलाकर मारने की योजना का
जिक्र मिलता है। माना जाता है कि वह स्थान जहां लाख का घर बनाया गया था
जिसमें पाण्डव पुत्रों को जलाकर मारने की योजना थी वह स्थान भी प्रयाग के
करीब है। यह स्थान वर्तमान में लच्छागिर नाम से जाना जाता है। यह स्थान
दुर्वासा ऋषि के आश्रम से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जो लोग
रेल मार्ग से यहां जाना चाहते हैं उन्हें हड़ियाखास रेलवे स्टेशन पर उतरकर
यात्रा करनी चाहिए। हड़ियाखास रेलवे स्टेशन से लच्छागिर की दूरी महज 5
किलोमीटर है।
राजापुर
भारतीय
जनमानस में रामकथा का प्रचार-प्रसार करने वाले महाकाव्य रामचरित मानस के
रचयिता तुलसीदास जी का जन्म स्थान यहीं माना जाता है। इस स्थान पर आज भी
तुलसीदास जी के हाथों से लिखी हुए अयोध्याकांड की प्रति सुरक्षित है। यह
स्थान इलाहाबाद स्टेशन से 30.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।