कार्तिक कृष्ण अष्टमी को देश के कई भागों में पुत्रवती महिलाएं व्रत रखती हैं। इस व्रत को अहोई अष्टमी व्रत के नाम से जाना जाता है। अहोई शब्द अनहोनी का अपभ्रंश है। मान्यता है कि इस व्रत से संतान की आयु लंबी होती है और उन्हें किसी अनहोनी का सामना नहीं करना पड़ता है। अहोई अष्टमी की तरह ही एक अन्य व्रत है तो पूर्वोत्तर भागों में काफी प्रचलित है। इस व्रत का नाम है जीवित पुत्रिका व्रत। दोनों ही व्रत का का मूल यही है कि संतान पर कोई संकट नहीं आये।
अहोई अष्टमी और जीवित पुत्रिका में एक बड़ी समानता है। जीवित पुत्रिका व्रत की कथा में बताया गया है कि दोनों बहनें थीं। छोटी बहन जीवित पुत्रिका का व्रत करती थी जबकि दूसरी बहन यह व्रत नहीं रखती थी। पूर्व जन्म के पुण्य और जीवित पुत्रिका के व्रत से छोटी बहन की कई संतान हुई और वह जीवित रही। जबकि बड़ी बहन की जो भी संतान होती वह अल्पायु में ही मर जाती थी। एक दिन बड़ी बहन ने ईर्ष्यावश छोटी बहन की संतान को मार देती है। लेकिन जीवित पुत्रिका के व्रत से छोटी बहन की सभी संतान जीवित हो जाती है।
कुछ इसी प्रकार की कहानी अहोई अष्टमी की है। अहोई अष्टमी की कथा में वर्णित है कि एक साहूकार की बहू दीपावली में घर की मरम्मत के लिए वन में मिट्टी लाने जाती है। मिट्टी काटते समय छोटी बहू के हाथों अनजाने में कांटे वाले पशु साही के बच्चे की मृत्यु हो जाती है। नाराज साही श्राप देती है, जिससे छोटी बहू के सभी बच्चे मर जाते हैं। बच्चों को फिर से जीवित करने के लिए साहूकार की बहू साही यानी साही माता और भगवती की पूजा करती है। इससे छोटी बहू की मृत संतान फिर से जीवित हो जाती है।
इस तरह दोनों ही व्रत में यह बताया गया है कि यह संतान की रक्षा करने वाला व्रत है। जीवित पुत्रिका व्रत और अहोई अष्टमी दोनों में एक महीने का फर्क होता है। जीवित पुत्रिका व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है जबकि अहोई अष्टमी व्रत आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है।