दो मित्र सज्जाद और करीम एक रेगिस्तान से गुजर रहे थे। पता नहीं, किसी बात पर दोनों में बहस छिड़ गई। बात इतनी बढ़ गई कि सज्जाद ने करीम को थप्पड़ जड़ दिया। करीम को दुःख तो हुआ, किंतु उसने कुछ कहा नहीं। वहां पड़ी बालू पर उसने लिख दिया, आज मेरे सबसे अजीज दोस्त ने मुझे थप्पड़ मारा।
यह लिखकर वह आगे बढ़ गया। सज्जाद भी साथ ही चल दिया। दोनों साथ चलते रहे, पर आपस में बोले नहीं। चलते-चलते उन्हें एक तालाब दिखाई दिया। करीम के मन में नहाने का ख्याल आया। वह पानी में उतरा।
सज्जाद भी उसी ख्याल से तालाब में उतरा। थोड़ा आगे बढ़ा, तो वह दलदल में धंसने लगा। अपने दोस्त को दलदल में फंसते देख करीम ने उसे बचा लिया। बाहर आकर सज्जाद ने एक पत्थर पर लिखा, मेरे मित्र ने मेरी जान बचाई।
जिस मित्र ने थप्पड़ मारा था, उसकी शिकायत करीम ने बालू पर लिखी थी। किंतु थप्पड़ मारने वाले मित्र सज्जाद ने जान बचाने की बात पत्थर पर लिखी। करीम से रहा नहीं गया। उसने पूछ ही लिया, तुमने जान बचाने की बात पत्थर पर लिखी। ऐसा क्यों?
सज्जाद करीम को बालू के उस ढेर के पास ले गया, जिस पर शिकायत लिखी थी। हवाओं ने वहां लिखी शिकायत मिटा दी थी। फिर वह करीम को उसी पत्थर के पास ले गया, जहां उसने अपने मित्र का आभार जताया था। सूरज की रोशनी में वह आभार दूर से दमक रहा था।