श्रुतकीर्ति एक बार अपने मित्र धर्मरथ के घर गया। उसने देखा कि उसके मित्र का घर बहुत विशाल और तीन मंजिला है। उस जमाने में तीन मंजिला घर होना बड़ी बात थी। इसके लिए बहुत धन और कुशल वास्तुकार की जरूरत थी। श्रुतकीर्ति ने यह भी देखा कि लोग धर्मरथ के घर की प्रशंसा करते थे।
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अपने घर लौटते वक्त श्रुतकीर्ति बहुत उदास था कि धर्मरथ ने सभी का ध्यान खींच लिया था। उसने उसी वास्तुकार को बुलवाया, जिसने धर्मरथ का घर बनाया था। उसने वास्तुकार से धर्मरथ के घर जैसा ही घर बनाने को कहा। वास्तुकार राजी हो गया। उसने काम भी शुरू कर दिया।
कुछ दिन बाद श्रुतकीर्ति काम का मुआयना करने गया। उसने नींव के लिए मजदूरों को गहरा गड्ढा खोदते देखा, तो वास्तुकार को बुलाया और गड्ढा खोदने का कारण पूछा। इस पर वास्तुकार ने बताया कि नींव बनाने के लिए गड्ढा खोदना है। यह खुदाई उसी के लिए है।
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इसके बाद पहली मंजिल, फिर दूसरी और आखिर में तीसरी मंजिल बनाऊंगा। मुझे इस सबसे कोई मतलब नहीं है! तुम सीधे ही तीसरी मंजिल बनाओ और उतनी ही ऊंची बनाओ, जितनी ऊंची तुमने धर्मरथ के लिए बनाई थी। नींव की और बाकी मंजिलों की परवाह मत करो, श्रुतकीर्ति ने कहा।
उसने वास्तुकार से यह भी कहा, तुम ऐसा नहीं करोगे, तो मैं किसी और से करवा लूंगा। उसे वास्तुकार ने मना कर दिया। उसने दूसरे वास्तुकार से इस काम के लिए कहा। मगर वह भी राजी नहीं हुआ। कोई भी वास्तुकार नींव के बिना घर नहीं बना सकता था, फलतः वह घर कभी न बन पाया। अतः किसी बड़े कार्य को संपन्न करने के लिए उसकी नींव मजबूत बनानी चाहिए एवं काम को योजनाबद्ध तरीके से करना चाहिए।