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महाभारत युद्ध के अंत में द्रौपदी ने क्यों कहा अश्वत्थामा को पुत्र

Thu, 01 Oct 2015 03:28 PM IST
सूरजमल मोहतो
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महाभारत का युद्ध जिस दिन समाप्त हुआ, उस दिन कृष्ण पांडवों को लेकर शिविर में नहीं लौटे। वह सात्यकि तथा पांडवों को लेकर वहां चले गए, जहां युद्धकाल में द्रौपदी तथा अन्य रानियां रहती थीं। उसी रात अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में आग लगा दी और पांडव पक्ष के बचे हुए वीरों के साथ ही द्रौपदी के पांचों पुत्रों को भी सोई हुई अवस्था में मार डाला।
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सुबह कृष्ण और पांडव लौटे। शिविर की दशा देखकर जो दुःख उन्हें हुआ, नारियों में जो क्रंदन व्याप्त हुआ, उसका वर्णन व्यर्थ है। महारानी द्रौपदी की व्यथा का पार नहीं था। उनके पांचों पुत्रों के मस्तकहीन शरीर उनके सामने पड़े थे।

‘मैं हत्यारे अश्वत्थामा को इसका दंड दूंगा।’ अर्जुन ने द्रौपदी को आश्वासन दिया। कृष्ण के साथ गांडीवधारी अर्जुन एक रथ में बैठकर चले। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके भी बच नहीं सका। अर्जुन ने उसे पकड़ लिया, किंतु गुरुपुत्र का वध करना उन्हें उचित नहीं जान पड़ा। रस्सियों से भली प्रकार बांधकर रथ में डालकर वह उसे ले आए और द्रौपदी के सम्मुख खड़ा कर दिया। अश्वत्थामा को देखते ही भीमसेन ने दांत पीसकर कहा, इस दुष्ट को तत्काल मार देना चाहिए।
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पांच-पांच पुत्रों की लाश सामने पड़ी थी और उनका हत्यारा सामने खड़ा था; किंतु द्रौपदी की दशा भिन्न थी। पशु समान बंधे, लज्जा से मुख नीचा किए अश्वत्थामा को देखकर वह पांडवों से बोली, यह क्या किया आपने? जिनकी कृपा से आप सबने अस्त्रज्ञान पाया है, वे गुरु द्रोणाचार्य ही यहां पुत्र रूप में खड़े हैं; झटपट छोड़ दीजिए। पुत्र-शोक कैसा होता है, यह मैं अनुभव कर रही हूं। इनकी पूजनीया माता कृपादेवी को यह शोक न हो।
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द्रौपदी की दया विजयी हुई। अश्वत्थामा के मस्तक की मणि लेकर उसे छोड़ दिया गया।
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