एक बार रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर मंदिर में आरती वगैरह के कार्यों से निवृत्त होकर बैठे थे। तभी वहां भुवन नाम की एक दाई (बच्चे का प्रसव कराने वाली) आई। परमहंस ने उससे कुशल क्षेम पूछा। दाई ने अपने घर-परिवार के हालचाल बताए और अपने आंचल में छिपाकर रखा हुआ बर्तन प्रस्तुत करते हुए कहा, स्वामी जी, मैं आपके लिए संदेस और रसगुल्ले लेकर आई हूं।
स्वामी रामकृष्ण ने हंसते हुए कहा, मुझे भूख नहीं है। अभी ही राखाल बाबू घर में बना हुआ संदेस और कचौरी लेकर आया था। मैंने छककर उनका सेवन किया है। फिर उन्होंने डकार भी ली, जैसे पेट बहुत भरा हुआ हो। दाई को तसल्ली हो गई कि परमहंस ने भरपेट भोजन किया हुआ है, और अब वह कुछ भी नहीं खाएंगे। उसने कहा, फिर कभी आऊंगी, तो बताकर आऊंगी। तब आप कुछ मत खाइएगा। अगली बार मेरे हाथ के बने हुए व्यंजन ही लेना।
रामकृष्ण परमहंस मुस्कराए और कहा, ठीक है-ठीक है। फिर दाई को उन्होंने अपने पास प्रेमपूर्वक बिठाया और खूब सारी ज्ञान की बातें कीं। करीब आधे घंटे की बैठक में उन्होंने दीन-दुनिया की शिक्षाएं भी दीं, और काली मां का प्रसाद देकर उसे विदा किया।
दाई के चले जाने के बाद पास ही बैठे उनके एक शिष्य ने पूछा, दाई मां, इतने प्रेम से आपके लिए संदेस-रसगुल्ले लाई थी। आपने खाने से इंकार क्यों किया? उसका जी दुखी हो रहा होगा। इस पर स्वामी जी ने उसे समझाया, डॉक्टरों, कवियों, दाइयों आदि से कुछ नहीं लेना चाहिए। ये लोग संसार का घोर कष्ट आंखों से देखते हैं, और उन्हीं कामों से अपनी आजीविका भी पाते हैं। इसलिए मैं उनकी कमाई से कोई भी वस्तु नहीं ले सकता।