भगवान बुद्ध से एक जिज्ञासु ने पूछा, मानव जीवन का लक्ष्य क्या है? उन्होंने बताया, निर्वाण अर्थात सभी बंधनों से मुक्ति। जिज्ञासु ने कहा, भगवान, आप लोगों को तरह-तरह के साधन बताते हैं। क्यों नहीं, उन्हें सीधे-सीधे निर्वाण प्रदान करते हैं?
बुद्ध ने उससे कहा, बिना मांगे किसी को कुछ देना ठीक नहीं है। तू ऐसा कर, गांव जाकर लोगों से उनकी महत्वाकांक्षा के बारे में पूछकर आ कि वे क्या चाहते हैं? उस व्यक्ति ने गांव के लोगों से उनकी महत्वाकांक्षा पूछी और कागज पर लिखकर बुद्ध के पास लौट आया।
बुद्ध के कहने पर वह पढ़कर सुनाने लगा कि किसी को धन चाहिए, तो किसी को स्वास्थ्य। किसी को पुत्र चाहिए, तो किसी को सुंदर स्त्री। किसी को मान-प्रतिष्ठा चाहिए, तो किसी को दीर्घायु।
बुद्ध सुनते रहे, फिर उन्होंने पूछा, क्या किसी ने निर्वाण की मांग की? उसने जवाब दिया, नहीं। बुद्ध ने कहा, कोई बात नहीं, एक तू तो है, जो निर्वाण प्राप्त करने के लिए तैयार है। चल पांच मिनट में मन बना ले और पत्नी, पुत्रों, धन-संपत्ति का मोह त्यागकर निर्वाण प्राप्ति के लिए तत्पर हो जाओ।
यह सुनकर उसने सकुचाते हुए कहा, मगर प्रभु, अभी तो मैंने अपने एक भी पुत्र का विवाह नहीं किया है। भला मैं निर्वाण कैसे प्राप्त कर सकता हूं?
बुद्ध मुस्कराकर बोले, यदि तू भी निर्वाण प्राप्ति के लिए तैयार नहीं है, तो मैं किसी को निर्वाण जबर्दस्ती कैसे दूं? यह सुनकर उस व्यक्ति का सिर झुक गया।