महानारायणोपनिषद् में कहा गया है, धर्मों विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा अर्थात धर्म ही समस्त संसार की प्रतिष्ठा का मूल है। भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि प्राणों पर संकट भले आ जाए, धर्म पालन से डिगना नहीं चाहिए। महाभारत युद्ध के दौरान दुर्योधन माता गांधारी के पास जाकर विजय की कामना के लिए आशीर्वाद की याचना किया करते थे।
गांधारी धर्म के तत्व को समझने वाली विदुषी महिला थीं। दुर्योधन आशीर्वाद की याचना करते, तो गांधारी कहतीं, यतो धर्मस्ततो जयः। अर्थात, जहां धर्म है, वहीं विजय है।
युद्ध में एक-एक कर गांधारी के समस्त पुत्रों का अंत हो गया। धर्मज्ञ होने के बावजूद वह एक मां थीं। उनका हृदय पुत्र-शोक से संतप्त हो उठा। कौरवों का नाश करने के बाद युधिष्ठिर पांडवों समेत गांधारी के पास संवेदना व्यक्त करने पहुंचे। वहां महर्षि व्यास भी आ पहुंचे। गांधारी ने जैसे ही पांडवों को देखा, तो वह अपने पुत्रों को याद कर धैर्य खोकर क्रोधित हो उठीं।
महर्षि व्यास समझ गए कि गांधारी शाप के शब्द निकालने को तत्पर हैं। उन्होंने कहा, राजकुमारी गांधारी, शांत हो जाओ। तुम्हें धैर्य खोकर पांडवों पर क्रोध नहीं करना चाहिए। आशीर्वाद की याचना किए जाने पर तुम दुर्योधन को एक ही बात कहती थी कि जहां धर्म है, वहीं विजय है। क्या पाडंवों की विजय के बाद भी तुम्हें विश्वास नहीं होता कि पांडवों की विजय धर्म की विजय है? यह सुनकर गांधारी शांत हो गईं।