बहेलिये ने देखा कि हिरनी नदी किनारे चली आ रही है। शायद पानी पीने के लिए। उसका अनुमान सही निकला। जब उसने पानी पीना शुरू किया, तो बहेलिये ने शिकार करने के लिए धनुष-बाण संभाला।
वह तीर चलाए, इसके पहले ही हिरनी बोल उठी कि बेशक तुम मुझे मारकर खा लेना, पर पहले मुझे बच्चों को प्यार कर उन्हें अपने पति के पास पहुंचा आने दो। बच्चों की व्यवस्था कर मैं खुद तुम्हारे पास चली आऊंगी। बहेलिये ने हिरनी की बात मान ली।
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हिरनी अपने बच्चों के पास आई, उन्हें प्यार किया और फिर पति को सारा किस्सा सुनाया। हिरन ने कहा, तुम बच्चों को लेकर घर जाओ। मैं बहेलिये के पास जाता हूं। हिरनी ने कहा, यह कैसे हो सकता है? वचन में मैं बंधी हूं, तुम नहीं।
इसलिए बहेलिये के पास मैं ही जाऊंगी। दोनों अपने-अपने तर्क देने लगे। स्नेह और प्रेम के लिए अपना बलिदान देने की स्पर्धा बढ़ते देखकर बच्चे बोले, हम अकेले कहां रहेंगे। हम भी साथ चलेंगे। और इस तरह सभी बहेलिये के पास जाने लगे।
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उधर हिरनी के परिवार की बातें सुनकर सियार चौंका। वह दौड़कर शेर के पास गया और सारा किस्सा बताकर बोला, हुजूर, आपका आहार लूटा जा रहा है। हिरन का पूरा परिवार अपनी बलि देने के लिए आतुर है। सभी बहेलिये के पास जा रहे हैं, ताकि वह उसका शिकार कर ले।
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चलिए, जल्दी कुछ करिए। अतः जैसे ही बहेलिया हिरणों पर तीर चलाने को हुआ, तो पीछे से झपटकर शेर ने उसे दबोच लिया। हिरनी अपने परिवार सहित जंगल में भाग निकली और परमात्मा को धन्यवाद दिया। कभी-कभार प्रकृति या ईश्वर के नियमों में फेरबदल होता है। उस बदलाव को दैवी विधान समझकर प्रसन्न रहा जा सकता है।