वत्सराज का मन राजा मुंज के आदेश का पालन करते हुए द्वंद्व में झूल रहा था। उनका आदेश था कि जंगल में किसी अज्ञात स्थान पर ले जाकर भोज का वध कर दिया जाए। सूर्यास्त होने लगा और धीरे-धीरे अंधेरा गहराने लगा था। वत्सराज ने एक जगह अपना रथ रोका और भोज को राज्यादेश सुनाया। मुंज का संदेश सुनकर भोज ने कहा, आपको राजा की आज्ञा का पालन करना चाहिए। श्रीराम ने वनवास का क्लेश सहा; श्रीकृष्ण का पूरा यादवकुल नष्ट हो गया। नल को अपना राज्य खोना पड़ा। सब काल के अधीन है।
वत्सराज भोज की निर्भीकता से वाकिफ होकर सिहर उठे। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने कहा, नहीं कुमार, मैं आपका वध नहीं कर सकूंगा। आप कोई संदेश लिख दीजिए। मैं उसे महाराज मुंज को सौंप दूंगा। कुमार भोज ने एक वटपत्र तोड़ा और उस पर एक श्लोक लिखा। श्लोक के भाव वही थे, जो भोज ने पहले कहे थे। इसके बाद वत्सराज कुमार भोज को किसी अज्ञात स्थान पर छोड़कर धारानगरी वापस लौट आए।
राजमहल में मुंज ने वत्सराज से पूछा, मरते समय भोज ने क्या कुछ कहा भी था? वत्सराज ने वह पत्र मुंज के हाथों में दे दिया। पत्र पढ़कर मुंज के मन में पता नहीं क्या उथल-पुथल मची कि वह बिलखने लगे। कुमार भोज के वध की खबर से हाहाकार मच उठा। स्थिति पर निगरानी रखने के लिए मंत्री बुद्धिसागर ने सभा-भवन में ही डेरा जमा लिया। मंत्री के विचारों से अवगत होकर वत्सराज ने मंत्री को चुपके से सच बता दिया। इसके बाद बुद्धिसागर और वत्सराज ने एक कापालिक की सहायता से नाटकीय ढंग से भोज को प्रकट किया; मानो उन्हें पुनर्जीवित किया हो। भोज के वापस आने पर राजा मुंज फूले नहीं समा रहे थे।