महिष्मती नगर की घटना है। एक सड़क के दोनों ओर स्वर्ण-आभूषणों की बड़ी-बड़ी दुकानें थीं। पूरे बाजार में धनाढ्य लोगों का ही आना-जाना था। जिस जगह अशर्फियों और मोहरों में ही कारोबार चलता हो, वहां लोहे और तांबे के सिक्कों की क्या पूछ!
खैर, एक महिला एक दुकान में गई। उसने अपने बटुए से एक जोड़ी कर्णफूल निकालकर सुनार को दिखाया। वह उन कर्णफूलों के समान एक और जोड़ी कर्णफूल बनवाना चाह रही थी। सुनार ने उन कर्णफूलों को हाथ में लेकर देखा और बगल में बैठे एक व्यक्ति को दे दिया। वह व्यक्ति उसे लेकर एक कक्ष के भीतर चला गया यह कहकर कि अभी बता रहा है। थोड़ी देर बाद वह कर्णफूलों को वापस देते हुए बोला, यहां के कारीगर ऐसा नहीं बना पाएंगे।
वह महिला निराश-सी लौट आई। पर उसे कुछ संदेह हुआ। उसने वे कर्णफूल निकालकर देखे। गौर से देखने पर पता चला कि उससे थोड़ा-सा सोना काट लिया गया था। वह वापस उसी दुकान पर गई और शिकायत की। दुकानदार ने सिरे से नकार दिया। यही नहीं, उसने उसे अपनी औकात के बारे में भी बताया। महिला के पास अपनी बात साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं था।
वह लौट ही रही थी कि एक मूंगफली बेचने वाला उसी दुकान के सामने से गुजरा। सुनार ने उसे बुलाया। मोल-भाव करने के बाद दो पैसे की मूंगफली देने को कहा। वह मूंगफली तौलने लगा। फटे-पुराने कपड़ों से उसकी गरीबी झांक रही थी। बाट से सही-सही तौलकर वह मूंगफली थैली में डालने लगा। सुनार ने कुछ मूंगफलियां उसकी टोकरी से उठाईं और अपनी थैली में रखते हुए कहा, एकदम बेईमान है। एक तो कम तौलता है, दूसरे भाव ज्यादा रखता है।