एक फकीर था। वह भीख मांगकर किसी तरह गुजर-बसर किया करता था। लोगों से मांगते हुए वह मालिक को याद करता और देने वाले तथा नहीं देने वाले, दोनों तरह के लोगों को दुआ देता। भीख मांगते-मांगते वह बूढ़ा हो गया। उसे कम दिखने लगा था।
वह अक्सर राह भटक जाता और कभी-कभी किसी को सामने न देखकर भी अपनी झोली फैला देता। जाहिर है, वहां से उसे कुछ नहीं मिलता, फिर भी वह उस अज्ञात हस्ती के लिए धन्यवाद देता और दुआ मांगता।
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एक दिन भीख मांगते हुए वह एक जगह पहुंचा और आवाज लगाई। किसी ने उससे कहा, 'आगे बढ़ जाओ! यह घर नहीं है। फकीर ने पूछा, भैया! तो फिर यह क्या है, और इसका मालिक कौन है? जवाब मिला, अरे पागल! तू इतना भी नहीं जानता कि यह मस्जिद है? इस घर का मालिक अल्लाह है।
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फकीर के भीतर से तभी कोई बोल उठा, यह लो, आखिरी दरवाजा आ गया। इससे आगे अब और कोई दरवाजा कहां है? इस आवाज को सुनकर फकीर के सामने जैसे अजाना संसार खुल गया। उसे दिखाई तो नहीं देता था, पर आंख की पलकें इस तरह ऊंची-नीची हुईं, जैसे कहने वाले के प्रति आभार व्यक्त कर रहा हो।
फिर वह एकाएक नाचने और मस्ती में झूमने लगा। मस्ती में झूमते हुए वह कहता जा रहा था, अब मैं यहां से खाली हाथ नहीं लौटूंगा। जो यहां से खाली हाथ लौट गए, उनके भरे हाथों की भी क्या कीमत है! वे कितने ही अमीर हो गए हों, पर ऊपर वाले की रहमत से तो वे खाली ही रह गए।
फकीर वहीं रुक गया और फिर कभी कहीं नहीं गया। और जब उस फकीर का अंतिम क्षण आया, तो लोगों ने देखा, वह तब भी मस्ती में झूम रहा था।