रेगिस्तान में बहुत कम फल उपजते थे। ईश्वर ने एक देवदूत से लोगों को यह कहलवाया कि प्रत्येक व्यक्ति दिन में केवल एक ही फल खाए। लोगों ने दिन में एक फल खाना शुरू कर दिया। एक ही फल खाने से इलाके में फलों की कमी नहीं पड़ी। बचे हुए फलों के बीजों से और भी कई वृक्ष पनपे।
प्रदेश की भूमि जल्द ही उर्वर हो गई और दूसरे प्रदेशों के लोग वहां बसने लगे। लेकिन लोग दिन में एक ही फल खाने के नियम पर कायम रहे। दूसरे प्रदेश से वहां आनेवाले लोगों ने भी इसी नियम का पालन किया। नतीजा यह हुआ कि फल धरती पर गिरकर सड़ने लगे।
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ईश्वर ने अपना नियम बदला और देवदूतों से कहलवाया कि लोग जितने फल खा सकते हैं, खाएं। और चाहें, तो वे आसपास के शहरों में रहने वाले लोगों को भी फल बांट सकते हैं। देवदूत ने लोगों को नया नियम बताया। लेकिन नगरवासियों ने उसकी एक न सुनी और उस पर पत्थर फेंके। ईश्वर को बताया गया कि पुराना नियम लोगों के मन में पत्थर की लकीर बन चुका है।
समय गुजरता गया। धीरे-धीरे नगर के युवक इस पुरानी बेतुकी प्रथा पर सवाल उठाने लगे। जब उन्होंने देखा कि उनके बड़े-बुजुर्ग टस-से-मस होने के लिए तैयार नहीं हैं, तो उन्होंने धर्म का ही तिरस्कार कर दिया। अब वे मनचाही मात्रा में फल खा सकते थे और उन्हें भी खाने को दे सकते थे, जो उनसे वंचित थे।
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केवल स्थानीय देवालयों में ही कुछ ऐसे लोग बच गए थे, जो अपने आपको ईश्वर के अधिक समीप मानते थे और ईशकृपा पाने के लिए पुरानी प्रथाओं का त्याग नहीं करना चाहते थे। सच तो यह है कि वे देख ही नहीं पा रहे थे कि दुनिया कितनी बदल गई थी और परिवर्तन सबके लिए अनिवार्य हो गया था।