एक अमीर आदमी तफरीह के लिए समुद्र में नाव लेकर चला। वह काफी दूर निकल गया था कि अचानक जोर का तूफान आया। नाव थपेड़ों से क्षतिग्रस्त होकर डूबने लगी, तो वह समुद्र में कूद पड़ा। तूफान थमा, तो उसने खुद को एक निर्जन द्वीप पर पाया।
उसने सोचा कि मैने जिंदगी में किसी का भी बुरा नहीं किया, फिर ईश्वर ने मुझे ऐसी विपदा में क्यों डाल दिया। अब पूरी जिंदगी यहीं बीतेगी। खैर रहने के लिए उसने एक झोपड़ी बनाई।
रात हुई और वह उसमें सो गया। रात में अचानक मौसम बदला, बिजलियां कड़कने लगीं, और एक बिजली झोपड़ी पर गिरी। देखते ही देखते उसमें आग धधकने लगी। अपने आश्रय को आग की लपटों में देखकर वह आदमी पूरी तरह टूट गया।
सिर पर हाथ धरे वह ईश्वर को कोस ही रहा था कि अचानक एक नाव टापू के किनारे आ लगी। उससे दो व्यक्ति उतर कर आए और कहने लगे कि यहां जलती हुई आग देखी, तो लगा कि कोई यहां मुसीबत में है और मदद के लिए संकेत दे रहा है।
उस व्यक्ति की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। वह बड़बड़ाया, हे ईश्वर, मैं हमेशा अपने मतलब से तुझे याद करता था। पर अब पता चला कि तू किसी के मानने-न मानने से बेपरवाह है। तू अकिंचन, निर्विकार, निस्पृह होकर, निष्काम कर्तव्य करता है। कौन तुझे क्या कहता है या क्या समझता है, तुझे इससे कोई मतलब नहीं।