शैतान ने यह तय किया कि वह अपने स्टॉक में रखे पुराने सामान को सस्ते में बेच देगा। उसने इसके लिए एक मुनादी करवाई। मुनादी सुनकर उसकी दुकान में ग्राहकों की भीड़ लग गई। शैतान जो सामान बिकवाना चाहता था, उसे उसने मेजों पर करीने से सजा दिया था।
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कुछ सामान की बानगी देखिए-सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों की राह में अटकाने के लिए छोटे-बड़े रोड़े थे। अपनी तारीफ बढ़ा-चढ़ाकर देखने के लिए बढ़िया दर्पण था। ऐसे चश्मे भी थे, जिन्हें आंखों पर लगा लिया जाए, तो दूसरे दो कौड़ी के दिखाई दें। कुछ चीजें दीवारों पर टंगी हुई थीं, जैसे पीठ पीछे वार करने के लिए पैने खंजर, झूठ और दूसरों को बकवास सुनाने वाले टेप-रिकार्डर आदि।
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दुकान के कर्मचारी खरीदने वालों से कहते, इनकी कीमत की चिंता मत करो। इन्हें अभी अपने घर ले जा सकते हो। कीमत आसान किस्तों में चुका देना। वहां घूम रहे एक ग्राहक ने दुकान के एक कोने में पड़े दो पुराने औजार देखे।
उन पर लगा टैग जता रहा था कि कीमत बहुत ज्यादा है। शैतान से उस ग्राहक ने औजारों के बारे पूछा। शैतान ने कहा, वे मेरे पसंदीदा औजार हैं। बहुत घिसे हुए भी हैं, क्योंकि मैंने उन्हें बहुत इस्तेमाल किया है।
शैतान ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, यदि लोगों का ध्यान उनकी ओर जाएगा, तो वे खुद को उनसे बचाना सीख जाएंगे। यह सुनने के बाद ग्राहक ने उन औजारों की कीमतों के बारे में पूछा। इस पर शैतान ने कहा, जो उन पर लिखी हुई कीमत है, बिल्कुल वाजिब है।
औजार भी तो कोई मामूली नहीं है। उनमें एक है, 'संदेह' और दूसरा 'हीन भावना'। बाकी सारे औजार कभी न कभी काम करना बंद कर देते हैं, लेकिन ये दोनों अपना काम हमेशा बखूबी करते हैं।