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तब मनुष्य धन वैभव त्यागकर वैरागी बन जाता है

Tue, 25 Mar 2014 12:36 PM IST
शिवकुमार गोयल
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भगवान श्रीराम समय-समय पर अपने गुरुदेव वशिष्ठ जी के आश्रम में जाकर उनका सत्संग किया करते थे। एक दिन सत्पुरुषों के सत्संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए महर्षि वशिष्ठ ने कहा, जिस प्रकार दीपक अंधकार का नाश करता है, उसी प्रकार विवेक-ज्ञान संपन्न महापुरुष हृदय स्थित आनंदरूपी अंधकार को हटा देने में सक्षम होते हैं।
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इसलिए सभी धर्मग्रंथों में प्रतिदिन किसी-न-किसी सत्पुरुष के सत्संग तथा शास्त्रों के स्वाध्याय पर बल दिया गया है। महर्षि वशिष्ठ ने आगे कहा, विवेकी महापुरुष इंद्रियनिग्रही, परम विरक्त तथा हर क्षण ब्रह्म का चिंतन करने वाले होते हैं।

जिनमें तमोगुण का सर्वथा अभाव है, जो रजोगुण से रहित हैं, जिनमें संसार के प्रति वैराग्य सुदृढ़ हो जाता है, ऐसे सत्पुरुषों का सान्निध्य बड़े पुण्य से प्राप्त होता है। आनंदस्वरूप आत्मा की अनुभूति हो जाने से साधक धन-संपत्ति, भोग-वैभव त्याग देने को तत्पर हो जाता है।
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श्रीराम ने पूछा, गुरुवर, ऐसे महापुरुष का सर्वोत्कृष्ट गुण क्या होता है? वशिष्ठ बताते हैं, उसका नाम है, विवेक। विवेक अधिकारी पुरुष की हृदयरूपी गुफा में ऐसे स्थित हो जाता है, जैसे निर्मल आकाश में चंद्रमा। विवेक ही अज्ञानी जीव को ज्ञान प्रदान करता है।
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ज्ञानस्वरूप आत्मा ही सबसे बड़ा परमेश्वर है। ज्ञानरूपी चिदात्म सूर्य का उदय होते ही संसाररूपी रात्रि में विचरता हुआ मनरूपी पिशाच नष्ट हो जाता है।
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