मार्टिन और क्रिस, दोनों अपनी रक्षा करते हुए टीले की चोटी पर चढ़ गए। चारों ओर काले-काले बादल घिरे हुए थे। मूसलाधार वर्षा हो रही थी। टीले के नीचे ह्वांग-हो नदी का तेज प्रवाह था और सभी दिशाओं में पानी-ही-पानी नजर आता था।
दोनों टीले के शिखर पर खड़े थे। मार्टिन चीनी सेना की वर्दी पहने हुए था, और भीगता हुआ भी सावधान मुद्रा में खड़ा था। क्रिस ने एक बड़ी-सी खाकी बरसाती में अपना शरीर लपेट रखा था। उसके शरीर पर कोई भी आभूषण नहीं दिख पड़ते थे। उसने कहा, मार्टिन, तुम्हें भी अपना घर डुबो देना होगा। मेड़ काट देना, नदी स्वयं भर आएगी।
मार्टिन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, क्रिस, क्या इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है?
क्रिस ने चौंककर कहा, औरों के भी तो घर थे, उन लोगों ने भी तो अपने घर बचाए!
इस पर मार्टिन ने तपाक से कहा, वे किसान थे। मैं सैनिक हूं। शायद अपने घर की रक्षा कर सकूं।
क्रिस ने झुंझलाते हुए कहा, मार्टिन, तुम्हें क्या हो गया है? तुम अकेले क्या करोगे? हम सब यहां से चले जाएंगे। हमारे बलिदान का क्या होगा? हमने अपने घर केवल इसीलिए डुबो दिए हैं कि शत्रु को आश्रय न मिले। और तुम...?
मार्टिन ने कहा, हां, मेरा घर इतना विशाल है कि उसमें समूचा गांव आकर रह सकता है। इसीलिए उसे डुबाना अधिक आवश्यक है। संपत्ति का इतना मोह क्रांति के मार्ग में बाधक है। यह सुनकर क्रिस को भी अचानक बोध हुआ। रोटी, कपड़ा, आश्रय आदि सब कुछ एक हद तक जरूरी है, लेकिन अदम्य और अटूट संकल्प सबसे ज्यादा जरूरी है। मार्टिन और क्रिस ने एक दूसरे की बात सुनी और दोनों टीले से उतरने लगे।