दो भाई-भानु और रोशन साथ खेती करते थे। मशीनों की खरीद-फरोख्त और दूसरी चीजों का व्यवसाय भी साथ करते। एक छोटी-सी गलतफहमी की वजह से उनमें पहली बार झगड़ा हुआ और झगड़ा दुश्मनी में बदल गया था।
एक सुबह एक बढ़ई भानु के पास काम मांगने आया। बड़े भाई ने कहा,' हां, मेरे पास तुम्हारे लिए काम हैं। उस तरफ देखो, वह मेरा भाई है। मेरे और उसके खेतों में पांच- सात दिन पहले तक घास हुआ करती थी, पर मेरा भाई बुलडोजर ले आया। उसने हमारे खेतों के बीच यह खाई खोद दी। जरूर उसने मुझे परेशान करने के लिए ही यह सब किया है। तुम खेत के चारों तरफ बाड़ बना दो, ताकि मुझे उसकी शक्ल भी न देखनी पड़े।'
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'ठीक है', बढ़ई ने कहा। भानु ने बढ़ई को सामान लाकर दे दिया। वह काम करने लगा और भानु खुद शहर चला गया। शाम को वह लौटा, तो चकित रह गया। इसलिए नहीं कि बढ़ई ने बहुत अच्छा काम किया था। बल्कि इसलिए कि उसने बाड़ लगाने का तो काम किया ही नहीं था। बल्कि उसने बाड़ की जगह खाई पर पुल बना दिया, जो खाई को एक तरफ से दूसरी तरफ जोड़ता था।
इससे पहले कि बढ़ई कुछ कहता, भानु का छोटा भाई रोशन आ गया। वह बडे़ भाई के पैरों पर गिरकर बोला, तुम कितने दरियादिल हो भैया। मैंने तुम्हें इतना भला-बुरा कहा। अपने खेत भी अलग कर लिए और खाई खोद दी। फिर भी तुमने यह पुल बनवाया, कहते-कहते उसकी आंखें भर आईं और दोनों गले लगकर रोने लगे।
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भानु और रोशन संभले, तो उन्होंने देखा कि बढ़ई जा रहा है। उसे जाता देख भानु ने कहा, मेरे पास तुम्हारे लिए और भी काम हैं। बढ़ई ठिठका और बोला, बेशक मैं रुक जाता, पर मुझे ऐसे कई पुल और बनाने हैं।