भिक्षुणी ने जेन गुरु हुइनेंग से पूछा, मैं कई वर्षों से महापरिनिर्वाण सूत्र का पाठ कर रही हूं। उसे समझने के लिए जरूरी ध्यान प्रयोगों का अभ्यास करते हुए भी बारह वर्ष बीत गए। लेकिन इनमें कही अनेक बातों को समझ नहीं पा रही हूं। कृपया मुझे ज्ञान दें।
आचार्य ने कहा, मुझे पढ़ना नहीं आता। यदि तुम मुझे वे अंश पढ़कर सुना दो, तो शायद मैं तुम्हें उनका अर्थ बता पाऊं।
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भिक्षुणी ने कहा, आपको पढ़ना नहीं आता, फिर भी आप इन गूढ़ शास्त्रों का ज्ञान कैसे आत्मसात कर लेते हैं? मैं तो शास्त्र का पारायण करती हूं। ध्यान के लिए बताए नियमों का पालन भी करती हूं। फिर भी समझ नहीं पाई। आप किस तरह समझा पाएंगे?
आचार्य ने कहा, तुम पढ़ कर बताओ तो सही। भिक्षुणी ने आचार्य की बात का खंडन किया। जेन गुरु कुछ नहीं बोले। उन्होंने आकाश की ओर नजरें उठाईं और कहा, तुम ऊपर आकाश में दूधिया रोशनी बिखेर रहे चांद को देखती हो। भिक्षुणी ने कहा, हां। इस पर हुइनेंग ने कहा, देख रही हो तो बताओ कि कहां है? भिक्षुणी ने आकाश में खिले चांद की ओर उंगली से इशारा किया और कहा, वह रहा।
हुइनेंग ने भिक्षुणी की उंगली पकड़ ली और कहा, यह तो तुम्हारी उंगली है। चांद कहां है? भिक्षुणी ने ठहाका लगाया, गुरु, यह उंगली चांद नहीं है। मैं इससे जिधर इशारा कर रही हूं, चांद वहां है।
जेन गुरु ने कहा, ठीक है। मैं भी तो यही समझाना चाहता हूं। महापरिनिर्वाण सूत्र के शब्दों में सत्य नहीं है। सूत्र तो आकाश में चमक रहे चंद्रमा की भांति है। सूत्र में आए शब्द हमारी उंगलियां हैं। उंगली से इशारा करके चंद्रमा की स्थिति को दर्शाया जा सकता है, पर उंगली चंद्रमा नहीं है। चंद्रमा को देखने के लिए दृष्टि को उंगली के परे ले जाना पड़ता है।