नदी के तट पर गुरुदेव ध्यान-साधना में लीन थे। उनका एक शिष्य उनके पास आया। उसने गुरु के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना के वशीभूत होकर दक्षिणा के रूप में उनके चरणों के पास दो बड़े-बड़े मोती रख दिए।
मोती रखकर वह ध्यान में लीन गुरु के सामने बैठ गया और उनके चेहरे की ओर देखने लगा। कुछ पल बीते, मिनट बीते और घंटों बीत गए। गुरु का ध्यान पूरा न हुआ। आखिर शिष्य की प्रतीक्षा पूरी हुई और सुबह का पहर बीत जाने पर करीब नौ बजे उनका ध्यान पूरा हुआ।
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गुरु ने नेत्र खोले, शिष्य की ओर देखा। शिष्य ने गुरु का यथोचित अभिवादन किया। फिर उसने भेंट की ओर इशारा किया। गुरु ने उन मोतियों को देखा और उनमें से एक मोती उठाया। वह उसे उलट-पलट कर देख ही रहे थे कि मोती छूटकर नदी में गिर गया।
मोती को धारा में गिरता देखते ही शिष्य ने नदी में तुरंत छलांग लगा दी। उसने तलाशा, पर वह मोती नहीं मिला। सतह पर आते ही फिर डुबकी लगाई। काफी देर तक पानी के भीतर रहकर वह मोती ढूंढता रहा, पर निराशा ही हाथ लगी। सतह पर आकर कुछ पल सांस ली और फिर गोता लगाया।
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फिर निराशा हाथ लगी। वह सतह पर कुछ देर के लिए आता और फिर नदी में कूद जाता। यह सिलसिला सुबह से शाम तक चलता रहा। नदी में उसने कई बार गोते लगाए, पर उसे वह मोती नहीं मिला।
अंत में निराश होकर उसने गुरु से पूछा कि आपने तो देखा था कि मोती कहां गिरा था। आप मुझे वह जगह बता दें, तो मैं उसे ढूंढकर वापस लाकर आपको दे दूंगा! गुरु ने दूसरा मोती उठाया और उसे नदी में फेंकते हुए बोले कि वहां। शिष्य ने सुना, देखा और फिर गोता लगाए बगैर ही गुरु के चरणों में बैठ गया। रात भर उसका ध्यान लगा रहा।