तेरहवीं सदी में महाराष्ट्र में एक प्रसिद्ध संत नामदेव हुए। एक बार वह शिष्यों को ज्ञान-भक्ति का प्रवचन दे रहे थे। तभी किसी शिष्य ने सवाल किया, हमें बताया जाता है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है। यदि ऐसा है, तो वह हमें दिखाई क्यों नहीं देता? यह कैसे मान लें कि वे सचमुच हैं, और यदि वे हैं, तो उन्हें कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
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नामदेव कुछ देर तक सोचते रहे, फिर शिष्य को एक लोटा पानी और थोड़ा-सा नमक लाने के लिए कहा। शिष्य तुरंत दोनों चीजें लेकर आ गया। सभी शिष्य सोच रहे थे कि इन चीजों का भला क्या काम कि तभी संत नामदेव ने पुनः उस शिष्य से कहा, पुत्र, तुम नमक को लोटे में डालकर मिला दो। शिष्य ने ठीक वैसा ही किया। फिर संत बोले, अब बताओ कि पानी में नमक दिख रहा है? सबने 'नहीं' में सिर हिला दिए।
संत ने कहा, ठीक है! अब कोई जरा इसे चखकर देखो कि क्या चखने पर नमक का स्वाद आ रहा है? एक शिष्य ने पानी चखते हुए कहा, जी, आ रहा है। फिर संत ने निर्देश दिया, अब जरा इस पानी को कुछ देर उबालो। कुछ देर तक पानी उबलता रहा, और जब सारा पानी भाप बनकर उड़ गया, तो संत ने फिर लोटे में देखने को कहा और पूछा, क्या अब आपको इसमें कुछ दिख रहा है?
एक शिष्य बोला, जी, हमें नमक के कण दिख रहे हैं। यह सुनकर संत मुस्कराए और शिष्यों को समझाते हुए बोले, जिस प्रकार पानी में नमक का स्वाद अनुभव किया जा सकता है, पर देखा नहीं जा सकता। और जिस तरह अग्नि के ताप से पानी भाप बनकर उड़ गया और नमक दिखाई देने लगा, उसी प्रकार तुम भक्ति, ध्यान और सत्कर्म से अपने विकारों को समाप्त करके ईश्वर को पा सकते हो।