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इस कारण को जान लीजिए जीवन में कभी दुखी नहीं रहेंगे

Thu, 13 Feb 2014 08:16 AM IST
शिवकुमार गोयल
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तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ काशी नरेश राजा विश्वसेन के पुत्र थे। पिता ने सोलह वर्ष की आयु में ही उन्हें सत्ता सौंप दी, लेकिन कुछ ही वर्षों में सांसारिक सुखों से उन्हें विरक्ति होने लगी।
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एक दिन उन्होंने पिता से कहा, मैंने काफी समय तक राजा के रूप में सांसारिक सुख-सुविधाओं का उपभोग किया है, फिर भी सुख के प्रति तृष्णा का क्षय नहीं हो पाया। जिस प्रकार ईंधन से अग्नि की ज्वाला का शमन नहीं होता, उसी प्रकार सुखोपयोग से तृष्णा की वृद्धि ही होती है।

उन्होंने आगे कहा, उपभोग के समय हमें जो सुख रुचिकर दिखाई देते हैं, वे दुख के रूप में सामने आते हैं। अतः अब मैं इन भ्रामक सुखों से ऊबकर जीवन सार्थक करने के लिए वन जाना चाहता हूं।
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राजपद छोड़ने के बाद वन गमन करने से पूर्व पार्श्वनाथ ने उपदेश देते हुए कहा, जीव इंद्रिय लोलुपता की संतुष्टि के लिए दुख के सागर में गोते लगाता रहता है, सत्कर्मों का त्यागकर दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त हो जाता है। लोभ, लालच, राग, द्वेष, चोरी, परस्त्रीगमन और अन्य कई प्रकार के पापों के मूल में मनुष्य की तृष्णा ही विद्यमान है।

सांसारिक सुख से विरत होने वाले परम संत पार्श्वनाथ ने तीस वर्ष की आयु में ही सभी शास्त्रों का सार ज्ञान ग्रहण कर लिया था। वह सामेदा की पहाड़ी पर साधनारत रहे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन लोगों को सत्कर्मों की ओर उन्मुख करने में बिताया।
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