प्रतापी सम्राट पोरस से युद्ध करने के बाद सिकंदर की सेना ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। वापस लौटने से पहले सिकंदर ने रावी के तट पर शासन कर रहे अश्वपति के राज्य पर आक्रमण कर दिया। अश्वपति के असावधान सैनिकों को सिकंदर के सिपाहियों ने बुरी तरह मारा-काटा।
अश्वपति बंदी बना लिए गए। उन्हें राजसभा में पेश किया गया। वहां अश्वपति का शौर्य जांचने के इरादे से सिकंदर ने उन्हें आजाद कर दिया और संधि कर ली। मैत्री का उत्सव मनाने के लिए दरबार आयोजित हुआ। अश्वपति अपने खूंखार लड़ाका कुत्तों के लिए मशहूर थे। चार कुत्ते हमेशा उनके साथ रहते थे। उन्हें अश्वपति दरबार में भी साथ ले गए। सिकंदर ने देखते ही व्यंग्य किया, महाराज, ये भारतीय कुत्ते हैं?
अश्वपति ने तुरंत कहा, हां, ये छिपकर आक्रमण नहीं करते, बल्कि शेरों से भी सामने से लड़ते हैं। यह सुनकर सिकंदर ने शेर और कुत्तों की लड़ाई आयोजित करने के लिए कहा। प्रबंध होते ही शेर और दो कुत्तों की लड़ाई छिड़ गई। शेर ने कुत्तों को लहूलुहान कर दिया, पर कुत्तों ने भी उसके छक्के छुड़ा दिए। शेर जान छुड़ाकर भागा। तभी कुत्तों ने उसके शरीर में ऐसे दांत चुभाए कि वह घायल होकर गिर पड़ा।
अश्वपति ने फिर चुनौती-सी दी कि कोई है ऐसा वीर, जो कुत्ते को शेर से अलग कर दे? बारी-बारी से कई योद्धा उठे और कुत्तों की टांगें पकड़ कर खींचने लगे, पर वे उनके दांत छुड़ा न सके। सिकंदर के सभी योद्धा हार गए, तो अश्वपति ने अपने अंगरक्षक को संकेत किया। वह उठकर शेर के पास पहुंचा और कुत्ते को पकड़ कर एक ही झटका लगाया कि शेर की हड्डी और मांस सहित कुत्ता भी खिंच गया। इस स्थिति से लज्जित हुए सिकंदर ने अपना सिर झुका लिया।